नई दिल्ली:– पौराणिक काल में शंखनाद के माध्यम से युद्धारम्भ की घोषणा और उत्साहवर्द्धन किया जाता था। आध्यात्मिक कार्यों में भी शंख ध्वनि का अपना विशेष महत्व है। वैज्ञानिक पक्ष देखें तो नियमित शंख ध्वनि का श्रवण करने से हृदय अवरोध, हृदय घात यानि दिल का दौरा नहीं पड़ता। शंखनाद करने से व्यक्ति के फेफड़े शक्तिशाली होते हैं, क्योंकि शंखा फूंकने पर पहले हवा फेफड़ों में जमा होती है, इस क्रिया से श्वास नली, फेफड़ों को शक्ति मिलती है।
शंखनाद से आसपास की नकारात्मक उर्जा का नाश होकर सकारात्मक उर्जा का संचार होता है, शंख नाद करने से स्मरण शक्ति में भी वृद्धि होती है। पूजा-अर्चना आदि सभी प्रकार के मांगलिक प्रसंगों में शंख ध्वनि की विशेष महत्ता है। मान्यता है कि शंख ध्वनि विजय के मार्ग को प्रशस्त करती है। पूजन के दौरान एवं पूजन पूर्णता पर की जाने वाली शंख ध्वनि से भक्त के मन को शांति प्राप्त होती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सिद्ध है कि नियमित शंखनाद करने से उसके सकारात्मक प्रभाव से वातावरण में व्याप्त हानिकारक सूक्ष्म जीवाणुओं का नाश होता हैं। विद्वानों का मानना है कि शंखनाद के दौरान वायुमंडल में कुछ विशेष प्रकार की तरंगे उत्पन्न होती हैं, जो ब्रह्मांड की कुछ अन्य तरंगों के साथ मिलकर अल्प क्षणों में ही समग्र ब्रह्मांड की परिक्रमा कर लेती हैं। ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करते हुए जब किसी एक तरंग को जब दूसरी अनुकूल तरंगें प्राप्त होती हैं तब दोनों तरंगों के समन्वय से मनुष्य को आत्मबल, प्रेरणा देने वाली, रोग, शोक आदि से रक्षा करने वाली, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली तरंगे उठने लगती हैं और मनुष्य अपने कार्य उद्देश्य में शीघ्र सफलता प्राप्त कर लेता है। तरंगे इतनी शूक्ष्म होती हैं कि उसका प्रभाव सरलता से द्रष्टिगोचर नहीं हो पाता।
शंखनाद के निरंतर प्रयोग से ही इन तरंगों के प्रभावों को समझा जा सकता हैं। विभिन्न शोधों से यह सिद्ध हो चुका हैं कि जिस प्रकार वाद्यों व ध्वनियों का छोटे-बड़े सभी जीवों पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ता हैं, उसी प्रकार शंख ध्वनि का प्रभाव भी जड़-चेतन पर पड़ता है।
