नई दिल्ली:– हर्षा रिछारिया अब संन्यास लेकर स्वामी हर्षानंद गिरि बन चुकी हैं। उज्जैन के मौनी तीर्थ आश्रम में उन्हें महामंडलेश्वर सुमनानंदजी महाराज ने विधिवत दीक्षा दी। लेकिन उनके इस संन्यास को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। मध्य प्रदेश संत समिति के अध्यक्ष महाराज अनिलानंद ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी आपत्ति जताई है।
यह संन्यास नहीं, सनातन परंपरा का अपमान
महाराज अनिलानंद ने कहा कि हर्षा रिछारिया का संन्यास सनातन धर्म की परंपराओं के अनुरूप नहीं है। उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा- “900 चूहे खाकर बिल्ली हज को नहीं जा सकती।” उनका आरोप है कि प्रयागराज कुंभ के दौरान हर्षा ने पहले संन्यास का दावा किया, लेकिन बाद में धर्म के खिलाफ अपमानजनक बयान दिए। ऐसे में उनका संन्यास स्वीकार्य नहीं हो सकता।
दीक्षा दिलाने वाले संत पर भी सवाल
संत समिति अध्यक्ष ने दीक्षा देने वाले महामंडलेश्वर सुमनानंदजी महाराज की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच होनी चाहिए और यह देखा जाए कि किन परिस्थितियों में दीक्षा दी गई।
अखाड़ा परिषद से हस्तक्षेप की मांग
मामले को गंभीर बताते हुए अनिलानंद महाराज ने अखाड़ा परिषद से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि संन्यास एक लंबी और अनुशासित प्रक्रिया है, जिसे वर्षों की साधना के बाद ही अपनाया जाता है। अचानक संन्यास लेना परंपरा के खिलाफ है।
कौन हैं हर्षा रिछारिया?
मूल रूप से झांसी की रहने वाली
परिवार वर्तमान में भोपाल में निवासरत
पिता बस कंडक्टर, मां बुटिक संचालक
पहले स्टेज एंकर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर
योग में विशेष कोर्स किया
महाकुंभ के दौरान वे संतों के साथ पेशवाई में रथ पर नजर आई थीं, जिसके बाद वे चर्चा में आईं। मीडिया में उन्हें “सुंदर साध्वी” तक कहा गया।
पहले क्या कहा था हर्षा ने?
हर्षा रिछारिया ने पहले कहा था कि उन्होंने “सुकून की तलाश में आध्यात्मिक जीवन” चुना है। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे साध्वी नहीं, बल्कि दीक्षा ग्रहण करने की प्रक्रिया में हैं। अब संन्यास लेने के बाद उन्होंने इसे अपने जीवन का नया अध्याय बताया है और धर्म व समाज सेवा के लिए समर्पित रहने की बात कही है।
आगे क्या?
उज्जैन में आने वाले धार्मिक आयोजनों को देखते हुए संत समाज इस मुद्दे को गंभीरता से ले रहा है। संत समिति की मांग है कि ऐसे मामलों में स्पष्ट नियम और जांच प्रक्रिया लागू की जाए, ताकि सनातन परंपराओं की मर्यादा बनी रहे।
