छत्तीसगढ़:- रायगढ़ जिले के भूपदेवपुर में स्थित बिलासपुर गांव में एक ऐसी परंपरा आज भी जीवित है, जिसे सुनकर और देखकर लोग हैरान रह जाते हैं. यहां राठिया परिवार में नई दुल्हन को घर में प्रवेश करने से पहले जलते हुए अंगारों पर चलना पड़ता है. जिसे एक अग्नि परीक्षा की तरह देखा जाता है. यह परंपरा 100 सालों से भी ज्यादा समय से जारी है. मान्यता है कि जो जोड़ा अंगारों पर चलकर घर में प्रवेश करता है, वह जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को मिलकर सहने की शक्ति प्राप्त कर लेता है.
रायगढ़ जिले के भूपदेवपुर के बिलासपुर गांव में एक अनोखी परंपरा आज भी जीवित है. यहां नई दुल्हन को घर की दहलीज लांघने से पहले जलते हुए अंगारों पर चलना पड़ता है. हाल ही में हुई एक शादी के बाद जब बारात वापस लौटी, तो परे गांव की मौजूदगी में इस अनोखी और कठिन अग्नि परंपरा का आयोजन किया गया.
गांव पहुंचने पर नवदंपत्ति का भव्य स्वागत किया जाता है और उन्हें नए वस्त्र व गहने भेंट किए जाते हैं. इसके तुरंत बाद मुख्य रस्म शुरू होती है. मड़वा (मंडप) के पास पहुंचते ही विधि-विधान से बकरे की बलि दी जाती है और उसके खून को मड़वा के नीछे बिछाया जाता है. इसके बाद मड़वा को चारों तरफ से कपड़ों से ढंक दिया जाता है.
रस्म के दौरान दूल्हे के पिता पर कथित रूप से देवता का आव्हान होता है. इसके बाद वे चूल्हे से धधकते हुए लाल अंगार लाकर मंडप के बीचों-बीच बिछा देते हैं. इसके बाद वे खुद उन दहकते हुए अंगारों पर नाचने लगते हैं. पिता के बाद दूल्हा और दुल्हन एक दूसरे का हाथ थामकर उन्हीं अंगारों के ऊपर सात फेरे लेते हैं. हैरानी की बात यह है कि अंगारों पर चलने के बावजूद भी उन्हें कोई चोट नहीं आती है.
स्थानीय निवासियों के अनुसार, बिलासपुर गांव में गंधेल गोत्र के केवल दो ही परिवार निकास करते हैं. यह परंपरा इन्हीं परिवारों में पिछले 100 से अधिक वर्षों से चली आ रही है. परिवार के बुजुर्ग भी यह नहीं बता पाते कि इसकी सटीक शुरुआत कब हुई, लेकिन पूर्वजों के प्रति अगाध श्रद्धा के कारण नई पीढ़ी भी इसे सहर्ष स्वीकार करती है.
राठिया परिवार का मानना है कि अग्नि पर चलना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पवित्रता और सामर्थ्य का प्रतीक है. ऐसी मान्यता है कि जो जोड़ा अंगारों पर चलकर घर में प्रवेश करता है, वह जीवन की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को मिलकर सहने की शक्ति प्राप्त कर लेता है.
