नई दिल्ली:– भारत में अनेक तीर्थ हैं। इन सभी का अलग-अलग धार्मिक महत्व है। बिहार के गया को पितरों की मुक्ति के लिए बड़ा तीर्थ कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम ने अपने पिता दशरथ और युद्धिष्ठिर ने भी अपने पूर्वजों का यहां पिंडदान किया था।इसलिए यहां श्राद्ध पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने के लिए लाखों लोग आते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिलता है। और उनका उद्धार होता है। गया जी का महात्मय कई पुराणों में भी मिलता है। वायु पुराण, गया महात्मय, गरुड़ पुराण विष्णु पुराण आदि में गयाजी में पिंडदान का महत्व बताया गया है। इस लिए अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने और उनका उद्धार करने के लिए वंश का कोई भी पुत्र यहां आकर विधिविधान से पितरों का पिंडदान करें।
किन चीजों से किया जाता है पिंडदान
पिंडदान के लिए चावल को गलाकर उसमें गाय का दूध, घी, गुड़ और शहद को मिलाया जाता है। इसके बाद उसके गोल-गोल पिंड बनाए जाते हैं। जनेऊ को दाएं कंधे पर पहनकर और दक्षिण की ओर मुख करके बैठा जाता है। इसके बाद केले के पत्ते पर इन पिडों को रखकर काले तिल मिलाकर इनसे पिंडदान किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि चावल से बने पिंड से पितर लंबे समय तक संतुष्ट रहते हैं।
प्गया को महाभारत में गयापुरी भी कहा गया है। गया का नाम गयासुर नाम के एक राक्षस के नाम पर रखा गया था, जिसे भगवान विष्णु ने मोक्ष प्रदान किया था। गयासुर ने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की और उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे देवी-देवताओं से भी अधिक पवित्र होने का वरदान दे दिया। इस वरदान के कारण घोर पापी भी गयासुर को देख या छू लेने से स्वर्ग जाने लगे। तब देवताओं ने छलपूर्वक एक यज्ञ के नाम पर गयासुर का शरीर मांग लिया। इसलिए गयासुर उस जगह पांच कोस में दक्षिण की तरफ मुंह करेक लेट गया। गयासुर के पुण्य प्रभाव से ही वह स्थान तीर्थ के रूप में स्थापित हो गया।
