नई दिल्ली: – भारत में करीब 3,000 साल गन्ने से चीनी बनाने का तरीका ईजाद किया गया। इसके बाद यह फारस की खाड़ी से होते हुए ईरान, चीन और ब्रिटेन समेत पश्चिमी देशों में पहुंची। धर्मयुद्धों के दौरान यूरोपीयों का एक बड़ा संपर्क भारत की चीनी से हुआ। यह तब हुआ जब कई पश्चिमी यूरोपीय देशों के योद्धा पवित्र भूमि (होली लैंड) गए। अपनी मुहिम खत्म होने के बाद वे यूरोप में बहुत महंगा ‘मीठा नमक’ लेकर आए, जिसने कई शासकों और अमीर नागरिकों की दिलचस्पी बढ़ाई। उस वक्त यूरोप में चीनी को मीठा नमक ही कहा जाता था। भारत से यह चीनी आज की फारस की खाड़ी से होते हुए यूरोप तक पहुंची थी। बाद में दुनिया ने अपना कई तरीका खोज निकाला। यूरोप में मुनाफे और बढ़ती मांग के चलते इस चीनी को ‘सफेद सोना (White Gold) भी कहा जाने लगा था।
फारस के राजा के हमले में चीनी गई ईरान
चीनी का सबसे पुराना जिक्र 510 BC का मिलता है, जब उस समय के फारस (Persia) के सम्राट डेरियस प्रथम ने भारत पर हमला किया था। वहां उन्हें ‘वह नरकट (reed) मिला जो बिना मधुमक्खियों के शहद देता है।’
चीनी बनाने की जानकारी पश्चिम में फारस तक और फिर 7वीं सदी AD के बाद पूरे इस्लामिक जगत में फैल गई। मध्यकालीन यूरोप में चीनी सिर्फ व्यापारिक रास्तों से ही पहुंची।
16वीं सदी में चीनी के बागान बनाए जाने लगे
16वीं सदी की शुरुआत में इस ‘नए मसाले’ की सप्लाई की संभावना ने ही पुर्तगाली कारोबारियों को नए खोजे गए ब्राजील में गुलाम बनाकर लोगों को भेजने के लिए प्रेरित किया। वहां, उन्होंने तेजी से बहुत अधिक मुनाफा देने वाली गन्ने की फसल उगाना शुरू कर दिया। 1680 के दशक तक, डच, अंग्रेज और फ्रासीसी सभी के कैरिबियन में गुलामों वाली कॉलोनियों के साथ अपने-अपने चीनी के बागान हो गए थे।
ब्रिटेन में चीनी को कहा जाने लगा सफेद सोना
18वीं सदी में, चाय और कॉफी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण मीठा करने के लिए चीनी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने लगा। 1874 में प्रधानमंत्री विलियम ग्लैडस्टोन ने मजदूरों के लिए बुनियादी खाने-पीने की चीजों की लागत कम करने के लिए चीनी पर लगने वाला 34% टैक्स खत्म कर दिया। सस्ता जैम (एक-तिहाई फलों का गूदा और दो-तिहाई चीनी) हर मजदूर वर्ग के घर की मेज पर दिखने लगा। ब्रिटेन और यूरोप में चीनी की बढ़ती मांग ने और ज्यादा उत्पादन और मुनाफे को बढ़ावा दिया, जिससे इसे ‘सफेद सोना (white gold)’ कहा जाने लगा।
चीनी की वजह से पूरब की ओर बढ़ा कारोबार
चीनी में बढ़ती दिलचस्पी से व्यापारियों का पूरब की ओर धीरे-धीरे विस्तार हुआ। खासकर वेनिस के लोगों द्वारा मध्य पूर्व में कुछ यूरोपीय बस्तियां बसाई गईं। चूंकि चीनी उगाने और उसे प्रोसेस करने में बहुत मेहनत लगती थी। इसलिए वेनिस, इटली और स्पेन के व्यापारियों द्वारा इसे यूरोप लाने के बाद भी इसकी कीमत ऊंची ही बनी रही।
मशीनीकरण ने चीनी के उत्पादन को दी रफ्तार
इंडस्ट्री की बड़ी मदद से 18वीं सदी में चीनी का उत्पादन ज्यादा मशीनीकृत और कुशल हो गया, जिससे भारी शारीरिक मेहनत वाले कामगारों की जरूरत खत्म हो गई। स्टीम इंजन की मदद से दुनिया भर में चीनी मिलें शुरू हुईं, जिससे मजदूर दिन-रात चीनी का उत्पादन कर सके।
1813 में इंग्लिश केमिस्ट एडवर्ड चार्ल्स हॉवर्ड की खोज ने भी चीनी उत्पादन में बड़ा सुधार किया। बंद केतली में चीनी के घोल को उबालने की उनकी तकनीक से चीनी की ज़्यादा पैदावार और कम उत्पादन लागत संभव हुई।
एक अमेरिकी ने शीरे से चीनी को अलग करने तरीका आया
1820 तक, चीनी को ‘मल्टीपल-इफेक्ट इवेपोरेटर’ में प्रोसेस किया जाने लगा, जिसे अमेरिकी इंजीनियर नॉर्बर्ट रिलियक्स ने डिजाइन किया था। चीनी उत्पादन की प्रक्रिया में आखिरी लेकिन बहुत महत्वपूर्ण सुधार 1852 में हुआ, जब अमेरिकी डेविड वेस्टन ने हवाई में शीरे (मोलासेस) से चीनी को अलग करने का मशीनी तरीका पेश किया।
अमेरिका की एंट्री और आजकल की शुगर-स्वीटनर
20वीं सदी में, शुगर को आर्टिफिशियल स्वीटनर और हाई-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप से कड़ी टक्कर मिली। हाई-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप को 1957 में रिचर्ड ओ. मार्शल और अर्ल पी. कूई ने बनाया था। इस प्रोडक्ट के फॉर्मूले में कई सुधार किए गए। 1977 में जब अमेरिका ने शुगर इम्पोर्ट टैक्स काफी बढ़ा दिया, तो इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।
स्थानीय स्तर पर बड़ी मात्रा में मक्का उपलब्ध होने के कारण अमेरिकी मैन्युफैक्चरर्स ने तेजी से शुगर प्लांट लगाए और कई तरह के फूड प्रोडक्ट्स में हाई-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप का इस्तेमाल शुरू किया। कोका-कोला और पेप्सी जैसे मशहूर इंटरनेशनल प्रोडक्ट्स भी ज्यादातर देशों में आम शुगर का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अमेरिका में उन्होंने हाई-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
