नई दिल्ली:– भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से चली आ रही आर्थिक वार्ता आखिरकार 27 अप्रैल 2026 को एक ऐतिहासिक समझौते में बदल गई। दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह कदम न केवल दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि वर्तमान वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में, विशेषकर पश्चिम एशिया संकट के प्रभाव को कम करने में भी मदद करेगा।
एक लंबी यात्रा का परिणाम
भारत और न्यूजीलैंड के बीच एफटीए की यह यात्रा 2010 में शुरू हुई थी। शुरुआती दौर की वार्ताओं के बाद 2015 में इस प्रक्रिया को रोक दिया गया था। हालांकि, बाद के वर्षों में फिर से प्रयास शुरू हुए और दिसंबर 2025 में दोनों देशों ने बातचीत को सफलतापूर्वक पूरा करने की घोषणा की। अप्रैल 2026 में इस समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर के साथ ही, दोनों राष्ट्रों ने अपने आर्थिक भविष्य के लिए एक नई साझेदारी की नींव रखी है।
भारत के लिए आर्थिक अवसर: निर्यातकों को मिली ताकत
इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ भारतीय निर्यातकों को मिलेगा। अब भारत अपने उत्पादों का 100 प्रतिशत निर्यात न्यूजीलैंड के बाजार में शुल्क मुक्त कर सकेगा। यह भारतीय निर्माताओं के लिए एक बड़ा अवसर है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां भारत की पकड़ मजबूत है।
भारत ने द्विपक्षीय व्यापार में 95 प्रतिशत हिस्सेदारी के लिए शुल्क में रियायत दी है, जिसमें 70.03 प्रतिशत शुल्क श्रेणियां शामिल हैं। यह कदम भारत के विनिर्माण क्षेत्र को 2030 तक 350 अरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचाने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा। सरकार और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कपड़ा (Textiles), प्लास्टिक, चमड़ा (Leather) और इंजीनियरिंग सामान जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने में मदद मिलेगी।
निवेश और सेवाओं का विस्तार
इस समझौते के तहत न्यूजीलैंड भारत में अगले 15 वर्षों में 20 अरब डॉलर का निवेश करेगा। यह भारी-भरकम निवेश भारत के विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, सेवा क्षेत्र और नवाचार (Innovation) जैसे क्षेत्रों में रोजगार सृजित करने में सहायक होगा।
सेवा क्षेत्र में भी भारत के लिए अपार संभावनाएं खुल रही हैं। आईटी, आईटी-आधारित सेवाएं, पेशेवर सेवाएं, शिक्षा और वित्तीय क्षेत्रों में भारत को विशेष लाभ मिलेगा। इसके अलावा, कुशल भारतीय पेशेवरों के लिए हर साल 5,000 अस्थायी रोजगार वीजा (Temporary Work Visa) की व्यवस्था की गई है, जिसके तहत उन्हें तीन साल तक रहने की अनुमति मिलेगी। भारत से शराब और स्पिरिट्स के निर्यात को भी शुल्क मुक्त कर दिया गया है।
किसानों और MSMEs के हितों का संरक्षण
समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने अपने कृषि और छोटे उद्योगों के हितों से कोई समझौता नहीं किया है। कुल 29.97 प्रतिशत शुल्क श्रेणियों को ‘संवेदनशील’ मानकर बाहर रखा गया है। इसमें दूध, दूध से बने उत्पाद (क्रीम, मट्ठा, दही, पनीर), सब्जियां (प्याज, चना, मटर, मक्का, बादाम), चीनी, कृत्रिम शहद, पशु/वनस्पति वसा, तेल, हथियार, गोला-बारूद, राल-अभुषण, तांबा और एल्युमीनियम जैसे उत्पाद शामिल हैं। इससे किसानों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को सुरक्षा मिलेगी और उनके बाजार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
न्यूजीलैंड के लिए बाजार पहुंच
न्यूजीलैंड को भी इस समझौते से काफी लाभ होगा। भारत ने ऑस्ट्रेलिया मॉडल की तर्ज पर न्यूजीलैंड को 70 प्रतिशत शुल्क श्रेणियों पर बाजार तक पहुंच दी है। न्यूजीलैंड के मांस, ऊन, कोयला और लकड़ी के उत्पादों को भारत में शुल्क मुक्त प्रवेश मिलेगा। सेब, कीवी, मनूका शहद और एल्ब्यूमिन जैसे कृषि उत्पादों पर शुल्क में रियायत दी गई है, हालांकि इन पर कोटा और न्यूनतम आयात मूल्य (Minimum Import Price) की शर्तें लागू रहेंगी। इसके अलावा, समुद्री उत्पादों (जैसे मसल्स और सैल्मन) के शुल्क में सात वर्षों में और स्टील व एल्युमीनियम के शुल्क में 10 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से कटौती की जाएगी।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया आर्थिक अनिश्चितताओं का सामना कर रही है। भारत की यह रणनीति न केवल ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने के लिए है, बल्कि एक नियम-आधारित व्यापारिक ढांचे को मजबूत करने के लिए भी है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी आर्थिक उपस्थिति को और अधिक प्रभावी बनाने में यह FTA भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण साबित होगा।
