गांधीनगर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात में शराबबंदी लागू है। यहां खुलेआम शराब बेच नहीं सकते और सार्वजनिक स्थलों पर लोग पी भी नहीं सकते। इस वजह से शराब पीने वालों को नियम-कायदों से दिक्कत होती है। इसके चलते शराबबंदी से जुड़ा मामला एक बार फिर हाईकोर्ट पहुंच गया।
हाईकोर्ट में शराबबंदी के विरोध में 5 याचिकाएं दाखिल हुईं, जबकि इसके समर्थन में 3 याचिकाएं लगाई गई हैं।हेल्थ परमिट के नाम पर पीते शराबयूंतो गुजरात में शराब बंदी है लेकिन परमिट के सहारे तमाम लोग शराब पी रहे हैं और पिला रहे हैं। आप सोचेंगे कि जब शराब बैन है तो सरकार परमिट कहां से दे रही है? यह परमिट हेल्थ डिपार्टमेंट देती है।
स्वास्थ्य का हवाला देकर कंट्री मेड फॉरेन लिकर (देश में बनी विदेशी शराब) पी सकते हैं। यह परमिट उनका शराब पीना कानूनी बनाता है। अगर आंकड़े देखें तो हेल्थ परमिट के नाम पर सबसे ज्यादा शराब अहमदाबाद में ही पी जा रही है। यहां अभी 13034 लोग हेल्थ परमिट के आधार पर शराब पीते हैं। वहीं सूरत में 8054 हेल्थ परमिट वाले लोग है। इन सबके अलावा पोरबंदर जो की महात्मा गांधी की जन्मभूमि है, वहां भी 1989 लोग हेल्थ परमिट वाले लोग है। सबसे कम हेल्थ परमिट वाला जिला ड़ांग है, जहां एक ही व्यक्ति के पास ऐसा हेल्थ परमिट है।
आंकड़े देखें तो कुल मिलाकर 70 प्रतिशत हेल्थ परमिट वाले लोग राज्य के चार प्रमुख जिले यानि की अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा और राजकोट जिले में ही हैंबाहर से आने लोग पी सकते हैं शराब शराबबंदी को लेकर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विक्रम नाथ एवं न्यायाधीश बीरेन वैष्णव की खंडपीठ में चली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने कहा कि 70 साल से गुजरात में शराबबंदी है, जबकि देश के अन्य कई राज्यों में ऐसा नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने शराबबंदी को निजता का हनन बताया। उन्होंने कहा कि, यह बंदी गुजरात के लोगों की निजता का हनन है और संविधान प्रदत्त समान हक की भी विरोधी है।
उन्होंने कहा कि, हमारे राज्य में मेडिकल के आधार पर 31 हजार परमिट दिए गए, जबकि पर्यटक या विजिटर्स को 66 हजार काम-चलाऊ परमिट दिए गए हैं। अगर बाहर से आने वालों को गुजरात में शराब पीने की छूट है तो फिर गुजरात के लोगों को शराब पीने के अधिकार से क्यों वंचित रखा जा रहा है।