
सुदामा और भगवान कृष्ण बाल सखा थे , समान ख्याति ज्ञान गुण विश्वास जिसमें विद्यमान हो उसे सखा कहते है, तो कृष्ण जी और सुदामा मित्र कैसे हुए ? क्योंकि सुदामा और कृष्ण जी दोनो ही सांदीपनी गुरु के आश्रम में साथ रहकर विद्याध्ययन में पढ़े है , और दोनो को ही गुरु सांदीपनी की कृपा आशीर्वाद से 64 कलाओं की विद्या प्राप्त हुई थी, जिन आलौकिक गुणों से भगवान युक्त थे उन्हीं गुणों से सुदामा भी परिपूर्ण थे, लेकिन सुदामा जी विरक्त संत थे । जितेंद्रिय होते हुए समस्त इंद्रियों पर नियंत्रण था । ब्रह्म ज्ञान के ज्ञाता थे और कृष्ण भक्ति में सदैव लीन रहते थे ।

भगवान से भेट करने की लालसा से 4 मुट्ठी चिवड़ा लेकर द्वारिकापुरी गए भगवान सिंहासन से उतर नंगे पाव महल में दौड़कर उनसे गले मिले और लिफ्ट कर रोने लगे , भगवान भी सुदामा से अद्वितीय प्रेम करते थे । भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा का यथोचित स्वागत किया ।

जहां कहीं मित्रता की बात आती है आज विश्व में या यों कहे समस्त लोकों में कृष्ण सुदामा की मित्रता का उदाहरण दिया जाता है ।परीक्षित जी का मोक्षभागवत की कथा सुनने से पितरों की मुक्ति होती है,दिव्य लौकिक कामनाओं की पूर्ति होती है,भगवान के श्री चरणों में प्रेम का संचार होता है,भय मन से दूर होजाता है,इसी प्रकार शुक देव जी के श्रीमद् भागवत कथा कथा सुनाने के उपरांत राजा परीक्षित भय मुक्त होकर अपने शरीर का त्याग कर मोक्ष प्राप्त करते है । कई जन्मों के पुण्य संचित जब उदय होते है तब हमे भागवत कथा श्रवण का सौभाग्य सुलभ होता है ।भगवान की असीम कृपा होने पर ही हमे यह अमृतमयई कथा रसपान का सुअवसर प्राप्त होता है ।