नई दिल्ली:– सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दहेज से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने साफ किया है कि यदि कोई पत्नी अपनी शिकायत में यह स्वीकार करती है कि उसने या उसके परिवार ने दहेज दिया था, तो मात्र इस बयान के आधार पर उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने एक पति द्वारा दायर उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने मांग की थी कि उसकी पत्नी के परिवार के खिलाफ दहेज देने के जुर्म में दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 के तहत FIR दर्ज की जाए। पति का तर्क था कि जब पत्नी खुद दहेज देने की बात मान रही है, तो वह भी कानूनन अपराधी है।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 7(3) पीड़ित (शिकायतकर्ता) को अभियोजन से सुरक्षा प्रदान करती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पीड़ित बिना किसी कानूनी डर के अपनी बात रख सके और शिकायत दर्ज करा सके। कोर्ट ने कहा कि केवल शिकायत या बयान के आधार पर कार्रवाई नहीं होगी।
यदि स्वतंत्र और ठोस सबूत मौजूद हों, तभी धारा 3 के तहत दहेज देने वाले पर केस संभव है। यहां कोर्ट ने 1982 की संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दहेज देने वाले अक्सर अपराधी नहीं बल्कि सामाजिक परिस्थितियों और दबाव के पीड़ित होते हैं।
