नई दिल्ली:– आज दुनिया के अलग-अलग देशों में इस्कॉन के मंदिरों में होने वाला हरे कृष्ण महामंत्र का संकीर्तन, भगवद्गीता का संदेश और कृष्ण भक्ति से जुड़ी गतिविधियां लाखों लोगों को आकर्षित करती हैं। इस्कॉन यानी International Society for Krishna Consciousness आज एक वैश्विक आध्यात्मिक संस्था के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। लेकिन इस विशाल आंदोलन की शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों के साथ हुई थी।जिस व्यक्ति ने कृष्ण भक्ति और वैदिक जीवनशैली के संदेश को भारत की सीमाओं से बाहर पहुंचाने का बीड़ा उठाया, उन्हें दुनिया ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के नाम से जानती है। 69 वर्ष की उम्र में वे अकेले अमेरिका पहुंचे थे। उनके पास न कोई बड़ा संगठन था और न ही कोई आर्थिक साम्राज्य। उनके पास था तो अपने गुरु का आदेश और कृष्ण के संदेश को पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाने का दृढ़ संकल्प।
आज इस्कॉन के मंदिर दुनिया के कई देशों में मौजूद हैं और इसकी गतिविधियां केवल मंदिरों तक सीमित नहीं हैं। आध्यात्मिक शिक्षा, पुस्तक प्रकाशन, प्रसाद वितरण, गुरुकुल, ग्रामीण समुदाय और जरूरतमंदों के लिए भोजन उपलब्ध कराने जैसे कई कार्यक्रम इससे जुड़े हुए हैं।
कलकत्ता में हुआ था अभय चरण डे का जन्म
स्वामी प्रभुपाद का जन्म 1 सितंबर 1896 को कलकत्ता में हुआ था। उनका बचपन और युवावस्था ऐसे दौर में बीती, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। युवा अभय चरण डे भी देश में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित हुए और महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरणा ली।
लेकिन उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वर्ष 1922 में आया। इसी दौरान उनकी मुलाकात महान वैष्णव विद्वान और आध्यात्मिक गुरु श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर से हुई।
कहा जाता है कि पहली मुलाकात में ही उनके गुरु ने अभय चरण को पश्चिमी देशों में कृष्ण चेतना का संदेश पहुंचाने की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित किया। उस समय यह काम बेहद कठिन माना जाता था। भारत से बाहर जाकर भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का प्रचार करना आसान नहीं था, लेकिन अभय चरण ने इस विचार को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।
गुरु के आदेश को बनाया जीवन का मिशन
1933 में अभय चरण ने श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर से औपचारिक दीक्षा ली। इसके बाद उन्होंने अपने गुरु के संदेश को आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम किया।
उन्होंने धार्मिक साहित्य का अध्ययन किया, लेख लिखे और बाद में कृष्ण भक्ति से जुड़े ग्रंथों को अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत करने का काम शुरू किया। उनका उद्देश्य था कि भारतीय वैदिक दर्शन और श्रीकृष्ण की शिक्षाएं केवल भारत तक सीमित न रहें, बल्कि दुनिया के उन लोगों तक भी पहुंचें जो इनके बारे में जानना चाहते हैं।
कई वर्षों तक उन्होंने पश्चिमी देशों की यात्रा की तैयारी की। इस दौरान आर्थिक और व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ।
69 साल की उम्र में शुरू किया अमेरिका का सफर
साल 1965 में वह ऐतिहासिक समय आया, जब लगभग 69 वर्ष की उम्र में स्वामी प्रभुपाद अमेरिका के लिए रवाना हुए। उन्होंने मालवाहक जहाज जलदूत से समुद्री यात्रा की।
यह सफर बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। यात्रा के दौरान उन्हें स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ा। लंबे समुद्री सफर के बाद जब वह अमेरिका पहुंचे तो उनके पास बहुत सीमित आर्थिक साधन थे।
कई स्रोतों में उनकी अमेरिका यात्रा के समय उनके पास लगभग 7 डॉलर होने का उल्लेख मिलता है। उनके साथ उनकी पुस्तकों और धार्मिक साहित्य का सामान भी था।
एक बुजुर्ग भारतीय संन्यासी के लिए उस समय अमेरिका जैसे देश में अकेले जाकर आध्यात्मिक आंदोलन शुरू करना किसी असंभव चुनौती से कम नहीं था।
न्यूयॉर्क में पेड़ के नीचे से शुरू हुआ अभियान
अमेरिका पहुंचने के बाद स्वामी प्रभुपाद ने न्यूयॉर्क को अपने कार्य का केंद्र बनाया। शुरुआत में उनके पास न कोई बड़ा मंदिर था और न ही बड़ी संख्या में अनुयायी।
उन्होंने लोगों के बीच जाकर कृष्ण चेतना का संदेश देना शुरू किया। टॉम्पकिंस स्क्वॉयर पार्क में वह कीर्तन करते, मंजीरे बजाते और लोगों को हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करवाते थे।
उस समय अमेरिका में बड़ी संख्या में युवा पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली से अलग रास्ते तलाश रहे थे। ऐसे माहौल में प्रभुपाद का सरल जीवन, कीर्तन और आध्यात्मिक संदेश कई युवाओं को आकर्षित करने लगा।
धीरे-धीरे उनके आसपास लोगों का समूह बनने लगा। लोग उनसे भगवद्गीता, कृष्ण भक्ति और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के बारे में जानने लगे।
यही छोटा-सा प्रयास आगे चलकर एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन की नींव बना।
1966 में हुई ISKCON की स्थापना
जुलाई 1966 में न्यूयॉर्क में स्वामी प्रभुपाद ने International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON की स्थापना की।
संस्था का मुख्य उद्देश्य श्रीकृष्ण की भक्ति, भगवद्गीता की शिक्षाओं और वैष्णव परंपरा के संदेश को दुनिया तक पहुंचाना था।
शुरुआत में यह एक छोटा संगठन था, लेकिन कुछ ही वर्षों में इसके अनुयायियों की संख्या बढ़ती चली गई। अमेरिका से शुरू हुई गतिविधियां धीरे-धीरे यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों तक पहुंचने लगीं।
कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों तक पहुंचा आंदोलन
स्वामी प्रभुपाद ने अपनी उम्र और स्वास्थ्य की परवाह किए बिना लगातार यात्राएं कीं। उन्होंने विभिन्न देशों में जाकर मंदिरों और आध्यात्मिक केंद्रों की स्थापना में नेतृत्व किया।
उनके जीवन के अंतिम वर्षों तक इस्कॉन का नेटवर्क कई देशों में फैल चुका था। मंदिरों के साथ-साथ गुरुकुल, आश्रम, कृषि समुदाय और प्रकाशन केंद्र भी स्थापित किए गए।
इस्कॉन के जरिए भगवद्गीता और कृष्ण भक्ति से संबंधित साहित्य का बड़े स्तर पर प्रकाशन और वितरण शुरू हुआ।
‘हरे कृष्ण’ महामंत्र बना आंदोलन की पहचान
इस्कॉन की पहचान बनाने में हरे कृष्ण महामंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही। मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर होने वाला संकीर्तन धीरे-धीरे इस आंदोलन की सबसे प्रमुख पहचान बन गया।
“हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे।
हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे।”
इस महामंत्र के सामूहिक जाप और संकीर्तन ने पश्चिमी देशों में लोगों का ध्यान खींचा। आगे चलकर यही कीर्तन इस्कॉन मंदिरों की प्रमुख गतिविधियों में शामिल हो गया।
किताबों के जरिए दुनिया तक पहुंचाया वैदिक ज्ञान
स्वामी प्रभुपाद केवल मंदिर स्थापित करने तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने बड़ी संख्या में धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकों का लेखन तथा अनुवाद किया।
उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘Bhagavad-gita As It Is’, ‘Srimad-Bhagavatam’ और ‘Sri Chaitanya-charitamrita’ शामिल हैं।
उनकी पुस्तकों का अलग-अलग भाषाओं में अनुवाद हुआ और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में उनका अध्ययन किया गया। इस तरह उन्होंने कृष्ण भक्ति और वैदिक दर्शन को किताबों के माध्यम से भी वैश्विक पाठकों तक पहुंचाया।
भारत लौटकर वृंदावन और मायापुर में स्थापित किए बड़े केंद्र
पश्चिमी देशों में कृष्ण चेतना का व्यापक प्रचार करने के बाद स्वामी प्रभुपाद ने भारत में भी इस्कॉन के प्रमुख केंद्र विकसित किए।
वृंदावन और मायापुर जैसे धार्मिक स्थलों पर इस्कॉन के बड़े केंद्र स्थापित हुए। इन स्थानों को दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं और भक्तों के लिए महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया।
आज भी मायापुर और वृंदावन इस्कॉन के सबसे प्रमुख केंद्रों में गिने जाते हैं।
जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने की पहल
इस्कॉन की गतिविधियों में भोजन वितरण भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना। मंदिरों में श्रद्धालुओं को प्रसाद उपलब्ध कराने के साथ-साथ जरूरतमंद लोगों तक भोजन पहुंचाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए गए।
Food for Life जैसे कार्यक्रमों के जरिए कई देशों में जरूरतमंदों को शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराने का काम किया गया। इस पहल ने इस्कॉन की सामाजिक गतिविधियों को भी एक अलग पहचान दी।
आज दुनिया भर में मौजूद हैं इस्कॉन के मंदिर
जिस आंदोलन की शुरुआत 1960 के दशक में न्यूयॉर्क के एक छोटे से केंद्र से हुई थी, वह आज दुनिया के कई हिस्सों में फैल चुका है। विभिन्न देशों में इस्कॉन के मंदिर, आश्रम, ग्रामीण समुदाय, शैक्षणिक गतिविधियां और रेस्टोरेंट संचालित होते हैं।
इस्कॉन की गतिविधियों में कृष्ण भक्ति के साथ-साथ शाकाहारी भोजन, सात्विक जीवनशैली, आध्यात्मिक शिक्षा और धार्मिक साहित्य का प्रचार भी शामिल है।
इसी वजह से आज इस्कॉन को केवल मंदिरों के संगठन के रूप में नहीं, बल्कि एक वैश्विक कृष्ण चेतना आंदोलन के रूप में देखा जाता है।
