नई दिल्ली:- दुर्गा की उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्र रविवार, 11 अक्टूबर से शुरू हो रहा है। पहले दिन कलश स्थापना के साथ माता के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। इसके बाद श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार व्रत, दुर्गा पाठ, आरती और माता के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करेंगे। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाला यह पर्व शक्ति की उपासना और भक्ति के लिए विशेष माना जाता है।
इस वर्ष नवरात्र रविवार से शुरू होने के कारण धार्मिक परंपरा में मां दुर्गा का आगमन हाथी पर माना जा रहा है। हाथी की सवारी को सुख-समृद्धि और अच्छी वर्षा का शुभ संकेत माना जाता है।
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है?
नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना करके देवी की पूजा का संकल्प लिया जाता है। द्रिक पंचांग के नई दिल्ली के लिए प्रकाशित समय के अनुसार, 11 अक्टूबर को घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक बताया गया है।
ध्यान रखें कि ये समय नई दिल्ली के हैं। रायपुर और दूसरे शहरों में सूर्योदय तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त अलग हो सकता है। इसलिए कलश स्थापना से पहले अपने शहर का पंचांग देखें या स्थानीय पुरोहित से समय की पुष्टि करें। चौघड़िया की शुभ बेला और घटस्थापना के विशेष मुहूर्त को एक ही समय मानकर पूजा तय करने से बचें।
पहले से जुटा लें पूजा की सामग्री
कलश स्थापना के लिए जरूरी सामग्री पहले से तैयार कर लेने पर पूजा व्यवस्थित तरीके से की जा सकती है। सामान्य रूप से इन वस्तुओं का उपयोग होता है:
मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर और लकड़ी की चौकी।
लाल कपड़ा, चुनरी, रोली, कुमकुम और अक्षत।
मिट्टी या तांबे का कलश, स्वच्छ जल और गंगाजल।
नारियल, सुपारी, सिक्का तथा आम या अशोक के पत्ते।
जौ बोने के लिए साफ मिट्टी और मिट्टी का पात्र।
फूल, धूप, दीपक, घी या तेल, फल और प्रसाद।
पूजा सामग्री और स्थापना की विधि में परिवार तथा क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है।
इस तरह करें पूजा स्थल की तैयारी
सबसे पहले पूजा करने की जगह साफ करें। स्वच्छ स्थान पर चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। पूजा की सामग्री पास में व्यवस्थित रखें।
स्नान करके साफ वस्त्र पहनें और शांत मन से पूजा शुरू करें। अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार व्रत या नियमित उपासना का संकल्प लें। परिवार में जिस विधि से नवरात्र की पूजा होती आई है, उसका पालन किया जा सकता है।
कलश स्थापना की सामान्य विधि
कलश में स्वच्छ जल भरें। परंपरा के अनुसार उसमें सुपारी, सिक्का और अक्षत डालें। कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें और ऊपर लाल कपड़े या चुनरी में लपेटा हुआ नारियल स्थापित करें।
इसके बाद भगवान गणेश का स्मरण करें और मां दुर्गा का आह्वान करके फूल, अक्षत, धूप, दीप तथा प्रसाद अर्पित करें। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा और आरती करें।
कलश को पूजा स्थल पर स्थिर और सुरक्षित जगह रखें, ताकि नियमित पूजा के दौरान उसे बार-बार हटाना न पड़े।
जौ बोने की परंपरा का रखें ध्यान
कई परिवारों में घटस्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा है। इसके लिए साफ मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरकर जौ के बीज बोए जाते हैं। फिर जरूरत के अनुसार थोड़ा जल दिया जाता है।
जौ और धान अलग-अलग अनाज हैं। यदि आपके परिवार में जौ बोने की परंपरा है तो उसी के बीज इस्तेमाल करें। पात्र में इतना पानी न डालें कि जल जमा हो जाए। साफ-सफाई बनाए रखते हुए अंकुरों की देखभाल करें।
हाथी पर माता के आगमन का क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, रविवार या सोमवार से नवरात्र शुरू होने पर देवी का आगमन हाथी पर माना जाता है। हाथी को वैभव और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।
इसी परंपरा में माता के हाथी पर आने को अच्छी वर्षा, कृषि में खुशहाली और धन-धान्य की वृद्धि का संकेत कहा जाता है। ये धार्मिक मान्यताएं हैं; इन्हें मौसम या फसल की निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए।
अष्टमी और विजयादशमी की तारीख भी जान लें
इस बार तिथियों को लेकर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। रायपुर के लिए प्रकाशित द्रिक पंचांग में 18 अक्टूबर को सप्तमी और 19 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी का पूजन बताया गया है। विजयादशमी 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इसलिए केवल अष्टमी तिथि शुरू होने का समय देखकर व्रत या कन्या पूजन का दिन तय न करें।
अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन करने और व्रत का पारण करने की परंपरा परिवारों में अलग हो सकती है। पारण का समय भी स्थानीय पंचांग तथा अपनाई गई पूजा पद्धति के अनुसार तय करें।
नवरात्र में नियमित पूजा और सात्विक आचरण का महत्व
नवरात्र में श्रद्धालु सुबह-शाम माता की आरती, मंत्र जाप और दुर्गा पाठ करते हैं। व्रत रखने वाले अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार करते हैं। पूजा के साथ स्वच्छता, संयम और सात्विक आचरण को भी महत्व दिया जाता है।
यदि अखंड ज्योत जला रहे हैं तो दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखें। उसे पर्दे, कपड़े और दूसरी ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें तथा देखरेख की व्यवस्था करें।
नवरात्र की आराधना अपनी क्षमता और श्रद्धा के अनुसार करें। पूजा की तैयारी पहले से पूरी कर लें और घटस्थापना, कन्या पूजन तथा पारण के लिए स्थानीय समय की पुष्टि जरूर करें।
