नई दिल्ली:– सनातन धर्म में अमरनाथ यात्रा का विशेष महत्व है। ‘बृंगेश संहिता’ और ‘नीलमत पुराण’ जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, बाबा बर्फानी के दर्शन का फल काशी से 10 गुना और प्रयाग से 100 गुना अधिक पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि इसी गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरता का रहस्य (अमर कथा) सुनाया था।अमरनाथ गुफा के सबसे पहले दर्शन को लेकर दो अलग-अलग कालखंडों की कथाएं मिलती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में कश्मीर घाटी एक विशाल झील थी। जब ऋषि कश्यप ने इस घाटी से जल को बाहर निकाला, तब हिमालय की यात्रा पर निकले ऋषि भृगु ने सबसे पहले इस पवित्र गुफा और बर्फानी शिवलिंग के दर्शन किए थे। इस प्रकार शास्त्रीय आधार पर ऋषि भृगु को ही इस शिवलिंग का प्रथम दृष्टा माना जाता है।
15वीं शताब्दी की लोककथा, बूटा मलिक का वृत्तांत
मध्यकाल में इस गुफा के दोबारा प्रकाश में आने का श्रेय बूटा मलिक नामक एक चरवाहे को दिया जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार एक बार बूटा मलिक को जंगल में एक साधु मिले, जिन्होंने उसे कोयले से भरा एक थैला दिया। जब वह घर पहुंचा तो कोयला सोने के सिक्कों में बदल चुका था। कृतज्ञता व्यक्त करने जब वह वापस उस स्थान पर गया, तो वहां साधु की जगह उसे एक विशाल गुफा मिली, जिसमें बर्फ का दूधिया शिवलिंग चमक रहा था। इसके बाद से ही यह स्थान आम जनमानस के लिए प्रमुख तीर्थस्थल बन गया।इतिहास और राजतरंगिणी के प्रमाण
अमरनाथ की यात्रा केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पुख्ता ऐतिहासिक साक्ष्य भी मिलते हैं। कल्हण द्वारा रचित 12वीं शताब्दी के ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ में अमरेश्वर (अमरनाथ) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। 11वीं शताब्दी में कश्मीर की रानी सूर्यमती ने अमरनाथ मंदिर को त्रिशूल, बानलिंग और अन्य पवित्र वस्तुएं भेंट की थीं, जो इस तीर्थ की प्राचीनता को प्रमाणित करता है।
