नई दिल्ली : आयुर्वेद में गंभीर से गंभीर बीमारियों का इलाज है. हालांकि कई ऐसी जड़ी-बूटियां हैं जिनका प्रयोग सीधे तौर पर आपको नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन कुछ का प्रयोग खाने में किया जाता है. यह खाने का जायका बढ़ाने के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता व कई बीमारियों में कारगर हैं.
चिरायता : हिमालयी औषधि चिरायता का प्रयोग कई बीमारियों में किया जाता है. चिरायता में मौजूद मेथेनॉल इंसान का मेटाबॉलिज्म बढ़ाकर वजन कम करता है. इसके अलावा इम्यूनिटी पावर बढ़ाने के साथ बल्ड प्यूरीफायर का काम भी करता है. कहते हैं कि यह करेला व नीम की तरह की कड़वा होता है. जबकि चिरायता शुगर समेत त्वचा रोगों लिवर कैंसर जैसे रोग में भी लाभकारी है. इसका काढा बनाकर भी सेवन किया जाता है. चिरायता को एक अच्छा लिवर डिटॉक्सिफायर माना जाता है. कब्ज और पेट से जुड़ी बीमारी में चिरायता बेहतर विकल्प है.
फरण: उच्च शिखरीय पादप शोध केंद्र की प्रोफेसर डॉ विजयलक्ष्मी के मुताबिक, फरण में सल्फर तत्व के मौजूद होने की वजह से यह ब्लड कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है. साथ ही फरण पाचन क्रिया के लिए टॉनिक के रूप में भी काम करता है. पहाड़ों फरण को तड़के के रूप में भी प्रयोग किया जाता है. यह हिमालयी क्षेत्रों के लोगों का मुख्य मसाला भी है. इसके मेडिसिनल बेनिफिट को देखते हुए दवा कंपनियों द्वारा इसका प्रयोग दवाइयों के निर्माण में भी किया जाता है. इसमें सल्फर कंटेनिंग कंपाउंड, फाइबर, एंटीआक्सीडेंट समेत कई मेडिसिनल प्रापर्टी भी पायी जाती हैं.
चमसूर: चमसूर का प्रयोग आप खाने में कई प्रकार से कर सकते हैं. यह इम्युनिटी बूस्टर के साथ महिला संबंधी कई समस्याओं को दूर करता है. चमसूर में फाइबर, मिनरल्स और विटामिन्स का भंडार है. यही वजह है कि यह सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता हैं. चमसुर गर्म तासीर की जड़ी बूटी है, इसलिए इसका प्रयोग सर्दियों के समय किया जाना बेहतर है. इसका सेवन शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी को भी दूर करता है.
चोरू : उत्तराखंड समेत अन्य हिमालयी राज्यों में आसानी से पाये जाने वाला चोरू अर्थात गंदरायण का वानस्पतिक नाम ऐंजेलिका ग्लॉका है. यह आयुर्वेद की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है. इसका प्रयोग भूख बढ़ाने से लेकर तव्चा रोगों में भी कारगर साबित है. इसमें एंजेलिक एसिड होने व इसके जड़ों से निकलने वाले राइजोम आयल भी काफी लाभदायक है. इसका प्रयोग खाने में भी किया जाता है. इसका छौंका खाने की खुशबू और जायके को कई गुना बढ़ा देता है.
खस की जड़ : आयुर्वेद में खस की जड़ में एंटीबैक्टीरियल, एंटी फंगल जैसे औषधीय गुण पाए जाते हैं. खस की जड़ का पानी बनाकर पिया जा सकता है. इसके लिए खस की जड़ को कुछ घंटों के लिए पानी की बोटल में छोड़ दें. इसके बाद इस पानी को पूरे दिनभर पीते रहें. इससे पेट और सीने की जलन से भी आराम मिलता है.
