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    अमेरिका को पीछे किया इस छोटे से देश ने, जहां हर छठवा परिवार है करोड़पति…

    By Tv 36 HindustanSeptember 4, 2024No Comments6 Mins Read
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    दुनिया का नक्शा देखेंगे तो भारत के नीचे दक्षिणी पूर्वी हिस्से में एक देश है मलेशिया. इसके एकदम दक्षिण छोर पर नजर डालेंगे तो दिखेगा एक छोटा सा द्वीप. एरिया के हिसाब से दिल्ली का भी आधा. इसका नाम है-सिंगापुर. 1963 में जब ये देश आजाद हुआ तब यहां भारी गरीबी थी. ज़्यादातर आबादी झुग्गी झोपड़ी में रहकर ही अपना जीवन बसर करने को मजबूर थे.लेकिन तब और अब में बहुत अंतर है. सिंगापुर की गिनती अब सबसे दौलतमंद मुल्कों में होती है. जहां का हर छठा परिवार करोड़पति है. पर कैपिटा जीडीपी के मामले में यूके, फ्रांस के अलावा अमेरिका जैसे सुपरपॉवर से भी आगे है. और तो और 2030 तक अनुमान है कि दुनिया में सबसे ज्यादा करोड़पति इसी देश में होंगे.आज इस देश की बात इसलिए क्योंकि 4 से 5 सितंबर तक भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां आधिकारिक दौरे पर पहुंचे हैं.

    वो 6 साल बाद सिंगापुर पहुंच रहे हैं. यहां दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने के लिए कई मुद्दों पर चर्चा होगी, सहमति भी बनेगी. तो आइए इस दौरे के बहाने ही जानते हैं कैसे एक बर्बाद और छोटे से देश से चमचमाती इमारतों का मुल्क बन गया सिंगापुर?

    …साथ में बेतहाशा गरीबीजब सिंगापुर एक स्वतंत्र देश बना तो किसी को उम्मीद नहीं थी कि वो एक दिन संपन्न देशों में शुमार होगा. उम्मीद होती भी कैसे. यह एक छोटा, गरीब द्वीप था. जिसके पास पास बहुत कम साझा इतिहास था और कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं थे.बाकी एशिआई देशों की तरह सिंगापुर भी लंबे समय तक ब्रिटेन की कॉलोनी रहा. फिर 1959 का साल आया जब सिंगापुर को पहली बार खुद से देश को चलाने का अधिकार मिला. इसी साल सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं- ली कुआन यू.आज जिस मुकाम पर सिंगापुर है उसका श्रेय ली कुआन यू को ही दिया जाता है. ली एक ऐसे समय में प्रधानमंत्री बने जब देश की इकॉनमी खस्ताहाल थी. लिहाज़ा देश को तरक्की के रास्ते पर ले जाने के लिए उन्हें सबकुछ शुरू से शुरू करना था.इसमें पहला कदम तो पड़ोसी देशों से संबंध बेहतर करना ही था. पर यहां भी निराशा हाथ लगी. क्योंकि पड़ोस में था मलेशिया देश.

    जहां मलय vs बाहरी लोगों का मुद्दा जोर पकड़ा हुआ था. वो इसलिए क्योंकि सिंगापुर में रहने वाले अधिकतर लोग चीन से आए थे. जो मलेशियन पार्टियों को फूटी आंख नहीं सुहाते थे.प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने इसका भी रास्ता ढूंढ़ निकाला, इस आस में कि अब कुछ दिक्कत नहीं आएगी. 1963 में उन्होंने सिंगापुर का मलेशिया में विलय करा दिया. पर ये गठबंधन ज्यादा समय तक चल नहीं पाया. आर्थिक से लेकर राजनीतिक मतभेदों की वजह से सिंगापुर 9 अगस्त 1965 को मलेशिया से अलग होकर एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र बना.ली कुआन अब पहले से भी कहीं ज्यादा बड़ी मुश्किल में थे. इसका अंदाजा आप वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट से लगा सकते हैं. जिसके मुताबिक 1965 में सिंगापुर की करीब आधी जनसंख्या अशिक्षित थी और प्रति व्यक्ति जीडीपी 500 अमरेकी डॉलर से नीचे थी, जो उस वक्त घाना देश के बराबर थी.

    आज, सिंगापुर में यह $100-130,000 है.छोटी छोटी मुहिम से की शुरुआतसिंगापुर भले ही एक गरीब देश था. सो, इसे इस मुकाम तक पहुंचा पाना इतना आसान भी नहीं था. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उसे यह सहूलियत भी थी कि यह बहुत कम जनसंख्या वाला एक छोटा देश था. ली ने अपने नेतृत्व में इन खूबियों का भरपूर फायदा भी उठाया.इसकी शुरुआत उन्होंने छोटी छोटी मुहिम चला कर की. जैसे लोगों को अच्छी अंग्रेजी बोलने पर जोर दिया, इसके लिए इसमें पैसे इनवेस्ट किए. गंदगी से भरे शहर को साफ सफाई के रास्ते लेकर गए. इसके लिए कड़े नियम बनाए. वहीं ली हमेशा से सिंगापुर में उद्योगों को प्रमुखता देते थे. मसलन, टैक्स दर न्यूनतम रखी, आसान दरों पर लोन मुहैया कराए, जिसकी वजह से बिजनेस खूब फैले फूले.

    यही नहीं 1966 में सरकार जमीन अधिग्रहण कानून भी लेकर आई. जमीन खरीद कर उस पर सरकारी मकान बनवाए गए. ताकि लोग सस्ती दरों पर अपना घर खरीद सकें. इसके लिए एक अलग स्कीम भी शुरू की गई ताकि लोग बचत करना शुरू करें. हर कर्मचारी की 25% तनख्वाह सरकारी सेविंग स्कीम में डाली जाती, जिसमें सरकार अपनी ओर से भी उतनी ही रकम देती.ली ने फॉरेन इंवेस्टमेंट पर खासा ध्यान दिया. ली का कहना था कि सफल होने के लिए सिंगापुर को एक कॉस्मोपॉलिटन सेंटर होना चाहिए, जो दुनियाभर के टैलेंट को आकर्षित करता हो. शानदार सड़कें और हाइवे निर्माण पर जोर दिया गया जिससे आधारभूत ढांचे का विकास किया जा सके.31 साल में किए कई दमनकारी कामसात बार चुनाव जीतने के बाद जब ली ने जब 1990 में पद छोड़ा, तो वह विश्व के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री थे.

    करीब 31 साल तक वो सिंगापुर की सत्ता पर काबिज रहे. लेकिन इस बीच उन्होंने कुछ ऐसे कदम उठाए जिसे दमनकारी बताया गया. वो एक तानाशाह के रूप में जाने जाने लगे.जैसे चोरी चकारी या ड्रग्स के धंधे करने वालों को जेल में ठूंसा जाने लगा. जनसंख्या को कंट्रोल करने के नियम कड़े किए.प्रेस की आजादी पर लगाम लगी, सरकार के खिलाफ बोलने वालों की बोलती उनकी संपत्ति कुर्क करके बंद की जाने लगी. जब ली से इन सब पर सवाल किए जाते तो वो सिर्फ एक ही बात कहते थे-जब तक कानून का राज न होगा, देश आर्थिक प्रगति नहीं कर सकता.ऐसे बदलता गया सिंगापुरजैसे-जैसे दुनिया की अर्थव्यवस्था बदली, वैसे-वैसे सिंगापुर भी बदला.

    अपने पहले दो दशकों के दौरान, सिंगापुर की अर्थव्यवस्था प्रति वर्ष लगभग 10% की दर से बढ़ी. पहले सिंगापुर मसालों, टिन और रबर का व्यापार करता था फिर ये फार्मास्यूटिकल्स में भी करने लगा. 1975 तक, सिंगापुर ने एक बड़ा औद्योगिक आधार स्थापित कर लिया था. जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 1965 में 14% से बढ़कर 22% हो गई थी.सिंगापुर का जीवन स्तर अब फ्रांस जैसे देश की तुलना में बहुत ऊंचा है, और जल्द ही ये दुनिया में टॉप पर जाने के लिए तैयार है. उदाहरण के लिए, सिंगापुर में शिशु मृत्यु दर में किसी भी अन्य देश की तुलना में तेजी से सुधार हुआ है. वहीं ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में हुआ है. सिंगापुर सरकार के मुताबिक़, 2023 तक सिंगापुर में अपना घर खरीदने वाले लोगों का प्रतिशत 100 में से 89.7 है.

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