कोरब:- सोने की लंका, शक्तिशाली राजा रावण और धर्म-अधर्म के बीच निर्णायक संघर्षरामलीला के मंच पर विभीषण की शरणागति का प्रसंग दर्शकों को सत्य, विवेक और मर्यादा का ऐसा संदेश दे गया, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया।
रावण की सभा में विभीषण निर्भीक होकर कहा कि पराई स्त्री का हरण राजा के लिए गौरव नहीं, बल्कि कलंक है। उन्होंने रावण को माता सीता को ससम्मान श्रीराम के पास लौटाने की सलाह देते हुए चेताया कि प्रभु श्रीराम से शत्रुता पूरे राक्षस कुल के विनाश का कारण बन सकती है। लेकिन सत्ता के अहंकार में डूबे रावण को भाई की सद्बुद्धि भी अपमान लगी। उसने विभीषण को देशद्रोही कहकर सभा से अपमानित कर दिया।
अपमान सहा, लेकिन अधर्म के आगे नहीं झुके!
विभीषण के सामने एक ओर अपना परिवार, राजमहल और वैभव था, तो दूसरी ओर सत्य और धर्म का मार्ग। उन्होंने वैभवशाली लंका का मोह त्याग दिया, लेकिन अन्याय का साथ स्वीकार नहीं किया। अंततः उन्होंने भगवान श्रीराम की शरण में जाने का संकल्प लिया।
श्रीराम ने दिया शरणागत को अभय
जब विभीषण वानर सेना के शिविर में पहुंचे, तो उनके रावण का भाई होने के कारण संदेह व्यक्त किया गया। इसके बावजूद भगवान श्रीराम ने शरणागत की रक्षा के अपने सिद्धांत को सर्वोपरि रखा और विभीषण को अपनाया। रामचरितमानस का यह प्रसंग प्रभु की करुणा और शरणागत-वत्सलता का अनुपम उदाहरण है।
रामलीला का संदेश: पद से बड़ा धर्म, अहंकार से बड़ा सत्य
विभीषण प्रसंग सिखाता है कि सच्चा हितैषी वह नहीं, जो गलत कार्यों में साथ दे।
