नई दिल्ली:- मंदिर में या घर में पूजा के बाद जब भक्तों को प्रसाद वितरित किया जाता है, तो आपने अक्सर देखा होगा कि लोग उसे दोनों हाथों से ग्रहण करते हैं, जिसमें दाईं हाथ ऊपर और बाईं हाथ नीचे होती है। यह केवल एक पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि यह प्रसाद के महत्व को बताती है। इसे सम्मान, विनम्रता, कृतज्ञता और ईश्वर की कृपा के रूप में स्वीकारा जाता है।
प्रसाद सामान्य भोजन से अलग माना जाता है, क्योंकि इसे पहले भगवान को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है और फिर भक्तों में बांटा जाता है। ऐसे में इसे दोनों हाथों से लेना भगवान के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक तरीका है।
क्या होता है प्रसाद?
‘प्रसाद’ शब्द संस्कृत के ‘प्रसादम्’ से जुड़ा है, जिसका अर्थ कृपा, अनुग्रह या ईश्वर की प्रसन्नता से लिया जाता है। पूजा के दौरान भगवान को फल, मिठाई, भोजन या अन्य सामग्री भोग के रूप में अर्पित की जाती है। पूजा के बाद यही सामग्री भक्तों को प्रसाद के रूप में बांटी जाती है। प्रसाद को भगवान के आशीर्वाद के तौर पर ग्रहण किया जाता है।
दोनों हाथों से प्रसाद लेने के भाव का अर्थ
विनम्रता और समर्पण
दोनों हाथों को आगे करके प्रसाद ग्रहण करना इस बात का प्रतीक है कि भक्त अपने अहंकार को पीछे रखकर ईश्वर की कृपा को स्वीकार कर रहा है। हाथों को कटोरी की तरह बनाकर प्रसाद लेना स्वीकार करने और समर्पण का भाव दर्शाता है।
सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक
किसी पूजनीय या पवित्र वस्तु को सम्मान के साथ ग्रहण करने की परंपरा रही है। प्रसाद को दोनों हाथों से लेना इसी सम्मान को दर्शाता है। यह एक छोटा सा भाव है, लेकिन इसके पीछे आदर और कृतज्ञता छुपी होती है।
मन को एकाग्र करने का माध्यम
मंदिर में पूजा के दौरान प्रसाद लेने का क्षण भक्त को कुछ देर के लिए ठहरने और उस अनुभव को महसूस करने का अवसर देता है। दोनों हाथों से प्रसाद लेते समय व्यक्ति सावधानी बरतता है और उसका ध्यान उस क्षण पर केंद्रित हो जाता है।
ऊर्जा का संचार
पूजा, मंत्र और भोग के बाद प्रसाद को पवित्र और सात्त्विक माना जाता है। यह सकारात्मक ऊजा से जुड़ा होता है।
प्रसाद कैसे ग्रहण करना चाहिए?
मंदिर या पूजा स्थल पर जाने से पहले हाथ साफ रखें।
प्रसाद लेते समय जल्दबाजी न करें।
दोनों हाथों को आगे करके श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करें।
कई परंपराओं में दायां हाथ ऊपर और बायां हाथ नीचे रखा जाता है।
प्रसाद को सम्मान के साथ ग्रहण करें और उसका अनादर न करें।
उसे तुरंत ग्रहण करें या घर ले जाकर खाएं।
प्रसाद का जमीन पर गिरना या उसका अनादर करना उचित नहीं होता।
कुछ लोग प्रसाद को ग्रहण करने से पहले माथे से भी लगाते हैं। यह भी सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने का एक तरीका है।
