महिला सरपंच की सूझबूझ ने 5 माह के अबोध बालक की बची जान, घरवाले डाँक्टर के बजाय झाड़फूंक का ले रहे थे सहारा
कोरबा/पाली, 8 मार्च। वर्तमान आधुनिकता के दौड़ में आज भी गांव की गरीब बस्तियों में निवासरत कई ऐसे परिवार है जो हर बीमारी को सिर्फ भूत- प्रेत व जादू- टोना से ही जोड़कर देखते है तथा डाँक्टर के इलाज से ज्यादा बैगा- गुनिया पर विश्वास रखते है। जो आसानी से उनके घर के आसपास अथवा गांव में मिल जाता है। चूंकि कभी- कभी तुक्का में झाड़फूंक से छोटे-रोग ठीक हुए रहते है, जिसका हवाला देकर लोग इसे सालों- साल मानते है। जिसकी मुख्य वजह गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ापन है। कई तो पढ़े- लिखे होने के बाद भी इस अंधविश्वास को बढ़ावा देते है, क्योंकि वे साक्षर तो हुए पर शिक्षित नही… जो समुदाय तर्क और विज्ञान को अपनी जिंदगी में उतार नही पाए। जिसके कारण इस पर सवाल भी नही कर पाते। जिनके अंध भरोसे से न जाने अपने कितनो की जाने चली जाती है। कुछ इसी तरह का वाक्या ग्राम डोंगानाला में देखने- सुनने को मिला जहां पिछड़ी जनजाति परिवार में गंभीर बीमारी से ग्रसित एक अबोध का उपचार डाँक्टरी के बजाय झाड़फूंक से कराया जा रहा था, किंतु जिले के वरिष्ठ अधिकारियों की जन-जागरूकता से सरपंच की सूझभरी पहल से बच्चे को समय पर चिकित्सीय लाभ देकर जान बचाया जा सका।
यह वाकया जिले के पाली विकासखण्ड अंतर्गत ग्राम पंचायत डोंगानाला के आश्रित ग्राम गणेशपुर में राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले बिरहोर जनजाति के लगभग 25- 30 घरों के परिवार निवासरत है। जहांयहां सुखदेव मांझी के पांच माह के पुत्र को गत कुछेक सप्ताह से सांस लेने में परेशानी हो रही थी। किंतु घरवाले जादूटोना व भूत- प्रेत बाधा समझ डाँक्टर के बजाय झाड़फूंक का सहारा ले रहे थे। बीते दिनों अबोध बालक की समस्या एकाएक बढ़ गई और सही तरीके से सांस न ले पाने के कारण वह छटपटाने लगा, लेकिन परिजन बैगा- गुनिया में ही लगे रहे। इस बात की जानकारी यहाँ की सरपंच पत्रिका खुरसेंगा को होने पश्चात वे सुखदेव के घर पहुँची, जहां उन्होंने देखा कि नन्हे दुधमुहे की हालत काफी गंभीर हो चली है जीवन संकट में है, उन्होंने बच्चे के परिजन को जमकर फटकार लगाते हुए बिना समय गवाएं अबोध को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाली लेकर पहुँची जहां के चिकित्सकों द्वारा प्राथमिक उपचार कर बच्चे की गंभीर हालत को देखते हुए बिलासपुर सिम्स रिफर कर दिया गया, सरपंच पीड़ित बच्चे को लेकर बिलासपुर पहुँची व अपने खर्च पर उसे शहर के एक निजी चिल्ड्रन हॉस्पिटल में भर्ती कराया। जहां चिकित्सकों की टीम बच्चे के आवश्यक उपचार में लग गई, और अततः अबोध की जान बचाई जा सकी और वह स्वास्थ्य लाभ ले रहा है। सरपंच के इस निस्वार्थ सहयोग व सेवाभावी कार्य को लेकर बच्चे के माता- पिता ने उनका धन्यवाद ज्ञापित किया तथा आगे किसी भी प्रकार के शारीरिक समस्या होने पर डाँक्टरी उपचार कराए जाने पर विश्वास जताया। इस विषय को लेकर सरपंच खुरसेंगा ने कहा कि गांव में अक्सर झाड़फूंक करने की संस्कृति को समाज के धरोहर का एक हिस्सा मानकर अनमोल समझा जाता है। यही अंधविश्वास न जाने कितनी जिंदगियाँ जोखिम में डाल रहा है तो कितनो असमय काल कलवित हो गए है। उपसंचालक आदिवासी विकास माया बरियर ने लोगों से अपील की, जरूरी है कि समाज को जागरूक बनाकर इस चलन को आमजनों के सहयोग से तोड़ा जाए।