नई दिल्ली:- सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में हाईकोर्ट में लंबित जमानत याचिकाओं के तेजी से निपटारे के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं. कोर्ट ने यह निर्देश जमानत याचिकाओं की बड़ी संख्या और उनके निपटारे में हो रही देरी के मद्देनजर जारी किए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट्स से कहा है कि जमानत याचिकाओं की सुनवाई तेजी से की जाए और इन्हें अनावश्यक रूप से टाला न जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाई कोर्ट को जमानत मामलों के निपटारे के लिए एक तय समय-सीमा तय करनी चाहिए. केंद्र या राज्य सरकार के अनुरोध पर बार-बार बिना किसी पुख्ता वजह के सुनवाई नहीं टाली जानी चाहिए.
नियमित अंतराल पर हो जमानत अर्जियों पर सुनवाई
हाईकोर्ट को इस तरह की व्यवस्था बनानी चाहिए ताकि जमानत मामलों की नियमित सुनवाई हो. हर केस कम से कम 15 दिन में सुनवाई पर आ जाए. नई जमानत याचिकाओं को जल्द से जल्द एक हफ्ते के भीतर लिस्ट किया जाना चाहिए. अगर कोई केस सुनवाई में नहीं आता, तो उसे ऑटोमैटिक रूप से दोबारा लिस्ट किया जाए.
तकनीकी वजहों से सुनवाई न टले
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमानत याचिकाओं पर शुरुआती सुनवाई से पहले ही जरूरी रिपोर्ट और दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया होनी चाहिए. याचिकाकर्ता के वकील को याचिका की अग्रिम प्रति राज्य के एडवोकेट जनरल या संबंधित एजेंसी को देनी चाहिए, ताकि तकनीकी वजहों से सुनवाई में देरी न हो.
SC ने पेंडिंग जमानत अर्जियों का ब्यौरा मांगा था
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट्स से अपने पास लंबित जमानत याचिकाओं का ब्यौरा मांगा था. हाईकोर्ट्स से प्राप्त आंकड़ों को देखकर कोर्ट ने पेंडेंसी पर चिंता व्यक्त की थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार, हाईकोर्ट और जांच एजेंसियों सभी को मिलकर एक मजबूत सिस्टम बनाना होगा, ताकि जमानत मामलों का शीघ्र निपटारा हो और पीड़ितों के अधिकार सुरक्षित रहें.
NDPS केस में हो रही देरी
सुप्रीम कोर्ट ने ड्रग्स केस (NDPS Act के तहत दर्ज मामलों) में जमानत याचिकाओं के निपटारे में देरी पर भी चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर इसलिए देरी होती है क्योंकि फॉरेंसिक रिपोर्ट समय पर नहीं मिलती. सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राज्य सरकारों से बात करें और यह सुनिश्चित करें कि फॉरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट समय पर उपलब्ध हो, ताकि केस अटकें नहीं।कोर्ट ने साफ किया कि जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान पीड़ित को भी सुना जाना चाहिए.
