नई दिल्ली:– जीवन एक यात्रा है, जिसका जीवन के हर पड़ाव पर अलग महत्व है। इसलिए हिंदू धर्म में 16 संस्कारों का वर्णन है, जो केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि व्यक्ति के मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अनिवार्य है। इन 16 संस्कारों का वर्णन मनुस्मृति, गृहसूत्र और धर्मशास्त्रों में भी मिलता है।
इन संस्कारों की शुरूआत जन्म से पहले होती है और मृत्यु के बाद यानि अंतिम संस्कार के साथ समाप्त होती है। नीचे इन संस्कारों का विस्तार से उल्लेख है। आइए बिंदुवार समझते हैं क्या है इनका महत्व और इनका क्रम-
जन्म के पूर्व के संस्कार-
गर्भाधान संस्कार- यह मनुष्य जीवन का पहला संस्कार है, जो संतान प्राप्ति यानि गर्भ धारण करने से पहले से शुरू होती है। इसके तहत दंपत्ति के मानसिक व शारीरिक शुद्धि के लिए संस्कार किया जाता है, ताकि स्वस्थ व संस्कारी संतान का जन्म हो।
पुंसवन संस्कार- इस संस्कार के तहत गर्भधारण के तीसरे माह में पूजा-पाठ किया जाता है, जिसमें पूरा परिवार शामिल होता हैं और मां और बच्चे को आशीर्वाद देते हैं। इसमें आने वाले शिशु के अच्छे स्वास्थ्य व मानसिक विकास की कामना की जाती है।
सीमंतोन्नयन संस्कार- प्रेग्नेंसी के चौथे, छठें या आठवें माह में यह संस्कार किया जाता है, जिसका उद्देश्य मां और बच्चे की सुरक्षा से जुड़ा होता है। आम भाषा में हम इसे गोद भराई या बेबी शॉवर कहते है। इसमें गर्भवती माता को अनाज, नेग, तोहफे और अनेकों आशीष दिए जाते है।
जातकर्म संस्कार- जन्म के बाद होने वाले इस पहले संस्कार में शिशु के स्वास्थ्य और सुखद भविष्य की कामना की जाती है। कई घरों में इस दौरान जन्म के समयानुसार नवजात बालक की कुंडली बनाई जाती है।
नामकरण संस्कार- जन्म के कुछ दिनों के बाद बच्चे का नाम रखा जाता है, जिसकी एक पूरी प्रक्रिया होती है। नाम, बच्चे के जीवन में पड़ने वाले प्रभाव, उसके भाग्य व स्वभाव सभी को दर्शाता है।
निष्क्रमण संस्कार- यह वह संस्कार है, जिसमें शिशु को पहली बार घर के बाहर लेकर जाते है और सूर्य व चंद्रमा के दर्शन कराए जाते है। इसका तात्पर्य बच्चे का प्राकृतिक से संबंध बनाना है।
अन्नप्राशन संस्कार- इस संस्कार में नवजात शिशु के 6 माह पूरे होने पर उसे पहली बार अन्न खिलाया जाता है। घर के बुजुर्ग बालक को खीर या चावल से बने व्यंजन खिलाते है और उस दिन से बालक थोड़ी-थोड़ी मात्रा में अन्न खाने की शुरूआत करता है।
मुंडन संस्कार- आमतौर पर बालक के तीन वर्ष पर पूरे होने पर यह संस्कार किया जाता है। मान्यता है कि इससे शिशु अपने पूर्व जन्म के मोह को त्याग कर अपने वर्तमान जन्म में पूरी तरह से वर्तमान में रम जाता है। इसे नदी या घाट के किनारे किया जाता है।
विद्यारंभ संस्कार- यह संतान की पहली शिक्षा संस्कार होती है। यहां से बच्चे की पहली विधिवत शिक्षा शुरू होती है। पुराने जमाने में गुरु व गुरुकुल होते है, जहां बच्चे को ले जाया जाता था, किंतु वर्तमान समय में कई स्कूल भी इस संस्कार को करते है।
कर्णभेद संस्कार- इसमें बच्चे के कान छिदवाए जाते है, जिसका सीधा संबंध स्वास्थ्य से माना जाता है। ये हमारे वर्वस सिस्टम से जुड़ा होता है।
यज्ञोपवीत संस्कार- इसे जनेऊ संस्कार कहा जाता है। इसके कई नियम है, जिससे जीवन में अनुशासन और जिम्मेदारी की अनुभूति का प्रवेश होता है।
उपनयन संस्कार- पूराने जमाने में इस संकार के तहत बालक को वेद आदि की शिक्षा शुरू की जाती है या यूं कहे कि हाइर स्टडीज की शुरूआत होती थी। किंतु आधुनिक समय में इसका तरीका बदल गया है।
केशांत संस्कार- यह संस्कार शिक्षा समाप्त होने के बाद की जाती है। जिसका अर्थ युवावस्था में प्रवेश माना जाता है।
समावर्तन संस्कार- शिक्षा पूरी होने के बाद जब युवा यथार्थ जीवन में कदम रखता है, तब यह संस्कार किया जाता है। इसका अर्थ है कि शिक्षा से जो भी ज्ञान अर्जित किया गया है, उसका इस्तेमाल अब वास्तविक जीवन में करना है।
विवाह संस्कार- सनातन धर्म में विवाह एक विशेष संस्कार माना जाता है। यह गृहस्थ जीवन के औपचारिक शुरूआत के साथ शुरू होती है। इस पड़ाव से परिवार व समाज की जिम्मेदारियां बढ़ जाती है।
अंतिम संस्कार- यह जीवन का अंतिम संस्कार है, जिसे दाह संस्कार या श्राद्ध कर्म कहते है। हिंदू धर्म में इसके बाद शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है।
