नई दिल्ली:- सूर्य की रश्मियों के साथ ही पितृगण पृथ्वी पर अवतरित होते हैं, अतः सूर्यदेव को हाथ जोड़कर प्रार्थना कर ले कि मैं श्राद्ध के लिए जरूरी धन और साधन न होने से पितरों का श्राद्ध करने में असमर्थ हूं, इसलिए आप मेरे पितरों तक मेरी भावनाओं और प्रेम से भरा प्रणाम पहुंचाएं और उनको तृप्त करें। पितरों के निमित्त गरीबों को भोजन, गाय को चारा खिलाना, जल में काले तिल डालकर तर्पण करने के पुण्य फल से पितरों सहित कर्ता का कल्याण होता है। यदि सच्चे मन से पितरों की सद्गति की कामना पितृपक्ष में की जाए तो पितृदेवता उससे भी संतुष्ट हो जाते हैं।
अपनी क्षमता के अनुसार जल, तिल और कुश से तर्पण करें।
पितरों का स्मरण करके श्रद्धापूर्वक प्रार्थना और संकल्प करें।
संभव हो तो किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न दें।
यदि भोजन कराने की स्थिति न हो, तो गाय, कुत्ते, कौए आदि के लिए भोजन निकालने की परंपरा
भी कई परिवारों में निभाई जाती है।
अत्यधिक खर्च, दिखावा या कर्ज लेकर श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है।
घर पर सरल रूप से कर सकते हैं स्मरण
यदि परिस्थितियां अनुकूल न हों, तो घर में स्वच्छ स्थान पर दीपक जलाकर पितरों का ध्यान किया जा सकता है। उनके नाम का स्मरण करते हुए जल अर्पित करें और परिवार की सुख-शांति तथा पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करें। अपनी क्षमता के अनुसार अन्नदान या सेवा का संकल्प भी लिया जा सकता है।
आश्विन मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर आश्विन मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक पितृपक्ष में धर्म-कर्म को मानने वाले, अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए तीर्थस्थानों पर जाकर पितरों की सद्गति के लिए श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म श्रद्धापूर्वक अर्पण करते हैं। जिनके पूर्वज पूर्णिमा के दिन दिवंगत होते हैं, वे श्राद्धपक्ष प्रारम्भ होने से एक दिन पहले श्राद्धकर्म सम्पन्न करते हैं, एक दिन पहले से ही महालय प्रारम्भ हो जाता है।
