नई दिल्ली:– सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि बहू को “तालमेल बैठाने” या “एडजस्ट करने” की सलाह देना अपने आप में दहेज उत्पीड़न या घरेलू हिंसा का अपराध नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पूरे ससुराल पक्ष को आपराधिक मामले में घसीटना कानून का दुरुपयोग है। कोर्ट ने कहा कि हर आरोपी के खिलाफ स्पष्ट, अलग और ठोस आरोप होना जरूरी है, तभी कार्रवाई उचित मानी जाएगी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह टिप्पणी मध्यप्रदेश के एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने ससुराल पक्ष की अपील स्वीकार करते हुए मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों में बिना पर्याप्त सबूत के पूरे परिवार को आरोपी बनाना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का इस्तेमाल निजी या पारिवारिक विवाद सुलझाने के हथियार के तौर पर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना जैसे मामलों में आरोप इतने स्पष्ट होने चाहिए कि यह साबित हो सके कि आरोपी ने क्रूरता, उत्पीड़न या अवैध दहेज मांग में सक्रिय भूमिका निभाई थी। सिर्फ यह कहना कि ससुराल वालों ने पति का साथ दिया या शादी में “एडजस्ट” करने की सलाह दी, अपराध की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने माना कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा बेहद जरूरी है, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बिना आधार के परिवार के हर सदस्य पर आपराधिक कानून की कठोर धाराएं न लगाई जाएं।
दरअसल यह मामला मध्यप्रदेश के गुना जिले का है। महिला ने 2019 में शादी की थी और जनवरी 2023 में पति व ससुराल पक्ष के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज कराया था। महिला का आरोप था कि शादी के समय नकद दहेज, गहने और घरेलू सामान लिया गया और बाद में भी पैसों की मांग की गई। हाई कोर्ट ने ससुराल पक्ष के खिलाफ कार्रवाई को सही माना था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर राहत दे दी है। इस फैसले को दहेज कानून के दुरुपयोग और पारिवारिक विवादों में कानूनी संतुलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
