नई दिल्ली:- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के समापन और विजयादशमी उत्सव के अवसर पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने संघ के 100 वर्षों के सफर, भारत की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक समरसता, और वर्तमान वैश्विक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने देशवासियों से एकजुट होकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की अपील की। आइए जानते हैं मोहन भागवत की भाषण की 10 बड़ी बातें
स्वदेशी और ‘स्व’ का बोध
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश की शताब्दी यात्रा के तहत ‘स्व’ के बोध और स्वदेशी के आचरण को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमने अपने देश के संविधान में अपने आप को एक प्रजा के रूप मे, विविधता के बावजूद भावनात्मक दृष्टि से एकरस समाज के रूप में, ‘हम भारत के लोग’ ऐसा, संबोधित किया है। उस भावनात्मक बंधन को उत्तरोत्तर दृढ़ बनाते जाने का दिग्दर्शन भी स्पष्ट शब्दों में उसी संविधान के मार्गदर्शक तत्त्वों में है।
संत रविदास और महापुरुषों का स्मरण
संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं जयंती, स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के कार्यों को याद करते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया गया। उन्होंने कहा कि जिस स्व की रक्षा के लिए इन महापुरुषों के बलिदान हुए, उसी आत्मबोध को समाज में स्वदेशी मेलों के द्वारा जागृत करने का प्रयास करने वाले ‘हिंदू मेला’ के प्रेरक व प्रवर्तक, बंग भूमि के स्वर्गीय राज नारायण बसु के भी जन्म का 200वां वर्ष चल रहा है।
नेपाल त्रासदी पर जताई चिंता
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने नेपाल त्रासदी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नेपाल में जिस भयंकर त्रासदी को झेलना पड़ा, हजारों मनुष्यों की बलि चढ़ गई, उसके मूल में कहीं ना कहीं सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र में जो भारत, तिब्बत, भूटान, चीन में चले एकांगी विकास का परिणाम है। ऐसे में विकास की समग्र व संतुलित दृष्टि निर्माण होना आवश्यक है।
विविधता में एकता का सनातन आधार
भारत की विविधता को स्वीकार करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि सनातन संस्कृति ही देश की एकता का मुख्य आधार है, जो सभी पंथों और जातियों को सम्मान देती है। समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए पांच प्रमुख बातों समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व-बोध और नागरिक अनुशासन को अपने जीवन में उतारने की अपील की गई।
नई पीढ़ी का नसीसत और OTT प्लेटफॉर्म्स
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया के दुष्परिणामों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को उचित-अनुचित का विवेक सिखाना जरूरी है और OTT प्लेटफॉर्म्स पर उचित नियंत्रण की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान काल में परिवार के बड़ों से, विद्यालयों के पाठ्यक्रम से अथवा समाज के वातावरण से यह संस्कार मिलना दिन-प्रतिदिन कम हो रहा है।
अनेक देशों में नई पीढ़ी को उन माध्यमों से मिलती हुई जानकारी बिना उचित-अनुचित का विवेक किये नई पीढ़ी ग्रहण करती है। उसके दुष्परिणामों का अनुभव ले चुकने के बाद उन देशों ने उन माध्यमों पर कुछ अनुशासन और निर्बंध लागू किये है। हमारे अपने देश में भी इस प्रकार की आवश्यकता, विशेषत: ‘OTT platforms’ को लेकर, समाज में अनुभव की जा रही है।
मोहन भागवत का नशे की समस्या पर वार
मोहन भागवत ने कहा कि नई पीढ़ी को उचित-अनुचित का विवेक करना सिखाना पड़ेगा। विवेक के अभाव में ही विश्वभर में नई पीढ़ी नशीली दवाओं की आदत की शिकार हो रही है। नशा एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है और उसके परिहार के लिए समय रहते शासन-प्रशासन तथा समाज को प्रयास प्रारम्भ करने चाहिए। समाज की वर्तमान अभिभावक पीढ़ी को यह विवेक नई पीढ़ी को देना पड़ेगा व नई पीढ़ी को अपनेआप को ऐसी आदत निर्माण करने वाले सभी प्रवृत्तियों से दूर रखना पडेगा। इस दृष्टी से भारत में इस समस्या का निराकरण करने वाले सभी को साथ लेकर देशभर में इस समस्या का निरास करने वाला एक देशव्यापी प्रतिरोध खड़ा हो इसलिए स्वयंसेवक प्रयास करेंगे।
हिन्दू भाव व स्वभाव पर क्या बोले भागवत?
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि ‘हिन्दू भाव’ किसी पूजा पद्धति या भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिकता, मानवता और विश्वबंधुत्व का प्रतीक है जो पूरी दुनिया को जोड़ सकता है। हमारे राष्ट्र की चेतना यही सनातन दृष्टि है, जिसे आज हम भारत के लोगों सहित सारा विश्व हिन्दू दृष्टि के नाम से जानता है। कोई विशिष्ट पूजा पद्धति, कोई विशिष्ट खान-पान, रहन-सहन, कोई सामाजिक या राजनीतिक मतवाद किसी विशिष्ट जाति, भाषा, प्रान्त इस की अनिवार्यता इसमें नहीं है।
