बिहार :– आरक्षण के मुद्दे को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। एनडीए के भीतर आरक्षण में क्रीमी लेयर और अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण जैसे मुद्दों पर चल रही बहस के बीच आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी पर सीधा हमला बोला है।
तेजस्वी यादव ने सवाल उठाया कि जिन नेताओं और उनके समुदायों ने आरक्षण की व्यवस्था से राजनीतिक अवसर हासिल किए हैं, वे अब इसी व्यवस्था में बदलाव या समीक्षा की बात क्यों कर रहे हैं। उन्होंने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को चुनौती देते हुए कहा कि अगर आरक्षण व्यवस्था पर आपत्ति है तो वे मंत्री पद छोड़कर सामान्य सीट से चुनाव लड़कर दिखाएं।
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी पर सीधा निशाना
तेजस्वी यादव ने अपने बयान में खास तौर पर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि आरक्षण को लेकर सवाल उठाने वालों को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें इस व्यवस्था से वास्तव में क्या आपत्ति है।
तेजस्वी का तर्क है कि आरक्षण के जरिए राजनीतिक और संवैधानिक प्रतिनिधित्व हासिल करने के बाद उसी व्यवस्था में बदलाव की मांग करना विरोधाभासी है। उन्होंने दोनों नेताओं से सामान्य सीट से चुनाव लड़ने की चुनौती भी दी। यह बयान ऐसे समय आया है जब एनडीए के भीतर आरक्षण में क्रीमी लेयर और अनुसूचित जातियों के बीच उप-वर्गीकरण को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है।
तेजस्वी यादव ने बिहार में आरक्षण की सीमा बढ़ाने के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने एनडीए नेताओं से सवाल किया कि अगर वे बिहार के जातीय सर्वे के आंकड़ों और आरक्षण के पक्ष में हैं तो 75 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं।
बिहार में 2023 में एससी, एसटी, ईबीसी और ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 65 प्रतिशत की गई थी। ईडब्ल्यूएस के 10 प्रतिशत आरक्षण को जोड़ने पर कुल आरक्षण 75 प्रतिशत तक पहुंचता था। हालांकि, जून 2024 में पटना हाईकोर्ट ने राज्य में 65 प्रतिशत आरक्षण बढ़ाने वाले कानून को रद्द कर दिया था।
तेजस्वी यादव ने बिहार के आरक्षण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग भी दोहराई। उन्होंने एनडीए से कहा कि अगर वह वास्तव में आरक्षण के पक्ष में है तो केंद्र सरकार के स्तर पर इस दिशा में पहल करनी चाहिए। उन्होंने सर्वदलीय बैठक बुलाने और एक कमेटी गठित कर इस मुद्दे पर आगे की रणनीति तैयार करने की चुनौती भी दी। तेजस्वी का कहना है कि बिहार और केंद्र दोनों जगह एनडीए की सरकार होने के कारण उसके पास आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए पर्याप्त राजनीतिक शक्ति है। ऐसे में केवल बयानबाजी के बजाय ठोस कार्रवाई की जानी चाहिए।
जातीय गणना के आंकड़ों को लेकर भी घेरा
आरजेडी नेता ने बिहार में हुई जातीय गणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए एनडीए नेताओं से उनकी स्थिति स्पष्ट करने को कहा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जातीय सर्वे के आधार पर विभिन्न वर्गों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सामने आई है, तो उसके अनुरूप प्रतिनिधित्व और आरक्षण को लेकर सरकार क्या कदम उठा रही है। तेजस्वी ने दावा किया कि आरक्षण की बहस सिर्फ चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि सरकारी संस्थानों और नौकरियों में वास्तविक प्रतिनिधित्व से भी इसे जोड़कर देखा जाना चाहिए।
तेजस्वी यादव ने आरक्षण के मुद्दे को न्यायपालिका, नौकरशाही और उच्च शिक्षा के संस्थानों में प्रतिनिधित्व से भी जोड़ा। उन्होंने दावा किया कि हाईकोर्ट के जजों, केंद्र सरकार के सचिव स्तर के अधिकारियों और विश्वविद्यालयों के कुलपतियों में एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम है। उन्होंने बीजेपी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या इन वर्गों में प्रतिभा की कमी है या फिर उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं।
रामदास अठावले और सुदेश महतो का भी लिया नाम
आरक्षण के मुद्दे पर तेजस्वी यादव ने सिर्फ चिराग पासवान और जीतन राम मांझी तक अपना हमला सीमित नहीं रखा। उन्होंने केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले और सुदेश महतो का भी नाम लिया। तेजस्वी ने आरोप लगाया कि एनडीए से जुड़े कुछ नेता आरक्षण का लाभ लेने के बावजूद अपने-अपने समुदायों से जुड़े व्यापक आरक्षण के सवालों पर स्पष्ट रुख नहीं अपनाते।
