नई दिल्ली:– ईरान के साथ बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका ने अपनी नौसैनिक रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। अमेरिका ने पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में तैनात अपने आखिरी विमानवाहक पोत यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को वहां से हटाकर मिडिल ईस्ट की ओर भेजने का फैसला किया है। यह पोत लंबे समय से क्षेत्र में तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह लेगा। अमेरिकी नौसेना के इस कदम से एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उसके सहयोगी देशों की चिंता बढ़ गई है, जबकि चीन के लिए इसे रणनीतिक अवसर के तौर पर देखा जा रहा है।
ईरान के खिलाफ अभियान से बढ़ा नौसेना पर दबाव
ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों के चलते यूएसएस अब्राहम लिंकन की तैनाती निर्धारित अवधि से आगे बढ़ गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, जहाज लगातार 240 से अधिक दिन समुद्र में रह चुका है। लंबी तैनाती के कारण नौसैनिकों पर मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ने के साथ-साथ आपूर्ति और आराम से जुड़ी समस्याएं भी सामने आई हैं।
इसी दबाव को कम करने के लिए यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को मिडिल ईस्ट भेजा जा रहा है। हालांकि, पश्चिमी प्रशांत से इसके हटने के बाद फिलीपींस और जापान जैसे अमेरिकी सहयोगियों के बीच सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
चीन के लिए क्यों अहम है अमेरिका का फैसला?
पश्चिमी प्रशांत में अमेरिकी विमानवाहक पोत की अस्थायी अनुपस्थिति चीन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बीजिंग लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन इस स्थिति का इस्तेमाल यह संदेश देने के लिए कर सकता है कि अमेरिका का ध्यान एशिया-प्रशांत से हट रहा है।
हाल के दिनों में चीन ने क्षेत्र में कई सैन्य गतिविधियां भी की हैं। दक्षिण चीन सागर में विवादित इलाकों के आसपास अभ्यास के अलावा चीनी नौसेना ने जापान के आसपास भी सैन्य गतिविधियां बढ़ाई हैं। ऐसे में अमेरिकी विमानवाहक पोत के हटने से क्षेत्र में शक्ति संतुलन को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
अमेरिका ने सहयोगियों को दिया भरोसा
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आने वाले महीनों में किसी दूसरे विमानवाहक पोत या अन्य सैन्य संसाधनों को क्षेत्र में भेजा जा सकता है। अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस कमांड के प्रमुख एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली ने भी मनीला पहुंचकर सहयोगी देशों को संयुक्त सैन्य अभ्यास और सहयोग बढ़ाने का भरोसा दिलाया है।
अमेरिकी नौसेना के सामने बढ़ी चुनौती
अमेरिका के पास कुल 11 विमानवाहक पोत हैं, लेकिन इनमें से आमतौर पर केवल दो या तीन ही सक्रिय रूप से तैनात रहते हैं। लगातार लंबी तैनाती के कारण जहाजों के रखरखाव और नौसैनिकों को पर्याप्त आराम देने की चुनौती बढ़ रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका के सीमित शिपयार्डों पर भी मरम्मत का दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा आधुनिक युद्ध में ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों के बढ़ते इस्तेमाल ने बड़े विमानवाहक पोतों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। कुछ रक्षा विशेषज्ञ छोटे युद्धपोतों और पनडुब्बियों पर ज्यादा ध्यान देने की वकालत कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, ईरान के साथ तनाव के बीच अमेरिका का पश्चिमी प्रशांत से विमानवाहक पोत हटाने का फैसला सिर्फ मिडिल ईस्ट की सैन्य जरूरतों तक सीमित नहीं है। इसका असर एशिया-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक स्थिति पर भी पड़ सकता है और चीन इस बदलाव का फायदा उठाकर अपनी सैन्य ताकत और क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन करने की कोशिश कर सकता है।
