नई दिल्ली:– क्या आपने इस बात पर गौर किया है कि भारत में गोल पिन वाले प्लग और दूसरे देशों जैसे कि अमेरिका, जापान और चीन आदि में चपटे पिन वाले प्लग इस्तेमाल होते हैं। इन्हें Flat Pin प्लग भी कहते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि बिजली से चलने वाले एक जैसे उपकरणों के लिए अलग-अलग पिन वाले प्लग इस्तेमाल करने की क्यों जरूरत पड़ती है? कई लोग इसे सिर्फ अलग-अलग देशों के अपने डिजाइन मान लेते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। इसे समझने के लिए आपको एक नजर इलेक्ट्रॉनिक्स के 100 साल पुराने इतिहास, वोल्टेज सिस्टम और सुरक्षा से जुड़े कारणों पर मारनी होगी।
दरअसल 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में बिजली का आविष्कार हुआ और धीरे-धीरे घरेलू उपकरणों में इसका इस्तेमाल होने लगा। उस समय कोई एक स्टैंडर्ड न होने की वजह से अलग-अलग कंपनियों ने अपने मन मुताबिक अलग-अलग आकार के प्लग और सॉकेट डिजाइन किए।
इस वजह से हर देश ने बिजली कंपनियों और देश में तैयार हो रहे उपकरणों के आधार पर इलेक्ट्रिकल ग्रिड तैयार किए। ऐसे में जब तक बात ग्लोबल स्टैंडर्ड तय करने पर पहुंची, तब तक करोड़ों घरों में वायरिंग हो चुकी थी, जिसकी वजह से एक कॉमन स्टैंडर्ड के हिसाब से पूरे सिस्टम को बदलना संभव नहीं था। इस वजह से अलग-अलग देशों में अलग-अलग आकार के प्लग देखने को मिल जाते हैं।
भारत में गोल पिन वाले प्लग को टेक्निकल तौर पर Type D और Type M कहा जाता है। इसकी जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी हैं। दरअसल भारत में बिजली का बुनियादी ढांचा ब्रिटिश हुकूमत के समय पर ही तैयार किया गया था। इस वजह से भारत ने उस समय के ब्रिटिश स्टैंडर्ड BS 546 को अपनाया।
आजादी के बाद भी इसी सिस्टम को इस्तेमाल करना जारी रखा गया क्योंकि देश में ग्रिड और सॉकेट इसी बनावट के हिसाब से तैयार हो चुके थे। वहीं ब्रिटेन ने 1947 के आस-पास अपने यहां चपटे आयताकार पिन वाले ‘Type G’ प्लग अपना लिए लेकिन भारत ने गोल पिन वाले प्लग का इस्तेमाल जारी रखा।
किसी देश के प्लग का डिजाइन उस देश की बिजली वोल्टेज और फ्रीक्वेंसी से भी जुड़ा होता है। भारत और यूरोप में वोल्टेज ज्यादा होती है। इससे बिजली के झटके का खतरा बना रहता है, जिसकी वजह से गोल पिन वाले सॉकेट का इस्तेमाल किया जाता है ताकि कोई उंगली या धातु आसानी से लाइव पिन के संपर्क में न आ सके।
वहीं अमेरिका या जापान में वोल्टेज कम होता है। कम वोल्टेज पर एक समान पावर देने के लिए ज्यादा करंट की जरूरत होती है। ऐसे में चपटे पिन वाले प्लग सॉकेट के अंदर ज्यादा सरफेस एरिया लेते हैं, जिसकी वजह से करंट का फ्लो सुरक्षित तरीके से होता है।
भारत और बाकी देशों में अलग-अलग प्लग होने का एक कारण सुरक्षा भी है। दरअसल अमेरिका या जापान में चपटे पिन एक दूसरे से थोड़े चौड़े होते हैं। इससे प्लग सॉकेट में सिर्फ एक ही दिशा मे जा पाता है। इससे लाइव और न्यूट्रल तार हमेशा सही जगह पर कनेक्ट होती है।
भारत में 3 पिन गोल प्लग में ऊपर वाली अर्थिंग पिन लंबी और मोटी होती है ताकि उपकरण में बिजली का प्रवाह शुरू होने से पहले ही अर्थिंग सुरक्षित हो जाए। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान वोल्टेज कनवर्टर और यूनिवर्सल ट्रैवल एडेप्टर की जरूरत पड़ती है।
