नई दिल्ली:– माघ मेले में हुए विवाद के बीच बड़ी खबर सामने आई है. ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के विवाद के बीच अब चारों पीठ के शंकराचार्य 2007 के बाद एक बार फिर एक मंच पर आ सकते हैं. बता दें कि चारों पीठ के शंकराचार्यों का एक मंच पर आना एक दुर्लभ घटना है. जब भी चारों आचार्य एक मंच पर आए हैं ये एक एतिहासिक और धार्मिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण घटना रही है. अब 19 साल बाद एक बार फिर से चारों पीठ के शंकराचार्य जी एक मंच पर आ सकते हैं. जानकारी के मुताबिक 10 मार्च 2026 को दिल्ली में गो रक्षा को लेकर बड़ा आयोजन होना है. जिसमें चारों शंकराचार्य आ सकते हैं. इस आयोजन के लिए 2 पीठ का समर्थन है, वहीं तीसरी पीठ (श्री गोवर्धन मठ) का समर्थन मिलने से असली नकली का विवाद और शंकराचार्य परंपरा और भारत की संत परंपरा को बांटने वालों के हथकंडे हल्के पड़ जाएंगे. पुरी पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी अब तक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के नाम पर खुली सहमति नहीं जाता रहे थे, लेकिन दो दिन पहले माघ मेला क्षेत्र में आचार्य ने अविमुक्तेश्वरानंद को अपना लाडला बताया था.
गोवध के कलंक के कारण सिंहासन, छत्र धारण नहीं करते पुरी के शंकराचार्य
बता दें कि गो रक्षा आंदोलन को लेकर पुरी पीठ (श्री गोवर्धन मठ) के शंकराचार्य पहले से ही आंदोलनरत हैं. गौ माता की रक्षा के व्रत के लिए पुरी पीठ के शंकराचार्य जी ने छड़ी, छत्र, सिंहासन, चंवर आदि का त्याग किया हुआ है. ये परंपरा इस पीठ के पूर्वाचार्य (144वें शंकराचार्य) स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी महाराज से चली आ रही है. शंकराचार्य का प्रण है कि जब तक भारत भूमि पर गौमाता का रक्त गिरेगा पुरी के शंकराचार्य ये सारी चीजें धारण नहीं करेंगे. गो रक्षा विषय पर चारों शंकराचार्य का एक मंच पर आने का मतलब होगा अविमुक्तेश्वरानंद पर सभी शांकराचार्यों की सहमति.
1779 में हुआ था पहला चतुष्पीठ सम्मेलन
जानकारी के मुताबिक 19 मई 2007 को बंगलोर में रामसेतु को लेकर हुए सम्मेलन चार पीठ के शंकराचार्य एक साथ एक मंच पर आए थे. पहला चतुष्पीठ सम्मेलन 1779 में श्रृंगेरी में हुआ था. जिसमें पहली बार चारों शंकराचार्य एक मंच पर आए थे. धार्मिक इतिहास में ये तीसरी बार होगा जब चारों आचार्य एक साथ दिखेंगे.
सनातन परंपरा के लिए होगा महत्वपूर्ण क्षण
सनातन परंपरा में शंकराचार्य का सर्वोच्च होता है, ऐसे में चारों पीठों के शंकराचार्यों का एक मंच पर आना सनातन परंपरा के लिए ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण क्षण होगा. गो रक्षा आंदोलन को लेकर पहले भी कई तरह कि आंदोलन हुए हैं. 1966 में गो रक्षा को लेकर सबसे बड़ा आंदोलन हुआ था. जो कि धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज की नेतृत्व में आयोजित किया गया था. इस आंदोलन को पुरी के वर्तमान शंकराचार्य (145वें) स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने जारी रखा है और अब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी इस पर खुलकर सामने आ रहे हैं.
