नई दिल्ली:– राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कनाडा में भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारत को केवल महाशक्ति के रूप में देखना सही नहीं है, बल्कि भारत अपनी परंपरा, स्वभाव और सेवा भाव के कारण ‘विश्वगुरु’ बना है। भगवत ने कहा कि भारत की पहचान दुनिया पर प्रभुत्व जमाने वाले देश की नहीं रही है। भारतीय संस्कृति में दूसरों की मदद करना और मानवता की सेवा करना सदियों से परंपरा का हिस्सा रहा है। इसी सेवा भाव और अपने मूल स्वभाव के कारण भारत को विश्वगुरु का स्थान मिला है।
मदद करना भारत की परंपरा
भागवत ने कहा कि भारत की सोच हमेशा से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की रही है। भारत ने कभी दुनिया को अपने अधीन करने की कोशिश नहीं की, बल्कि जरूरत के समय दूसरे देशों और समाजों की मदद करने को प्राथमिकता दी।उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति केवल उसकी आर्थिक या सैन्य क्षमता में नहीं है। भारतीय समाज की वास्तविक ताकत उसकी संस्कृति, मूल्यों और मानव कल्याण की भावना में है।
महाशक्ति बनना लक्ष्य नहीं
भागवत ने कहा भारत की वैश्विक भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि भारत का लक्ष्य केवल महाशक्ति बनना नहीं होना चाहिए। भारत को ऐसा राष्ट्र बनना है जो अपनी क्षमता का इस्तेमाल पूरी मानवता के कल्याण के लिए करे। उन्होंने कहा कि दुनिया में भारत की स्वीकार्यता उसके इसी दृष्टिकोण से बनी है। भारत जब अपनी परंपराओं और मूल्यों के अनुरूप आगे बढ़ता है, तो उसका प्रभाव केवल देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ता है।
सेवा और संस्कृति से मिली पहचान
मोहन भागवत के मुताबिक, भारत का ‘विश्वगुरु’ होना किसी दूसरे देश पर वर्चस्व स्थापित करने से नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, सेवा और मानवता के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ा है। उन्होंने भारतीयों से अपनी जड़ों और सांस्कृतिक मूल्यों को समझते हुए आगे बढ़ने का आह्वान किया। उनका कहना है कि आधुनिक विकास के साथ-साथ भारत को अपने उस स्वभाव को भी बनाए रखना होगा, जिसने उसे दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई है।
