नई दिल्ली:- फरवरी में 28 दिन होते हैं, पर हर 4 साल बाद एक दिन अतिरिक्त बढ़ जाता है, जिसकी वजह से 29 दिन हो जाते हैं. आपको इसका कारण तो मालूम होगा कि ऐसा क्यों होता है. पर क्या आप ये जानते हैं कि फरवरी में 30 तारीख भी होती है?
इतिहास में ऐसे 2 मौके दर्ज हैं, जब 30 फरवरी की डेट को शामिल किया गया था. सबसे पहले बात स्वीडन की. 1700 के दौर में फिनलैंड भी स्वीडन का हिस्सा था. तब स्वीडन ने तय किया था कि वो जूलियन कैलेंडर से शिफ्ट होकर ग्रेगोरियन कैलेंडर की ओर बढ़ेंगे. जूलियन कैलेंड में साल 1700 एक लीप ईयर होना चाहिए था, पर स्वीडन में लीप ईयर नहीं मनाया गया था. पर एक गड़बड़ हो गई और 1704, 1708 के साल को लीप ईयर मान लिया गया
इस वजह से देश जूलियन और ग्रेगोरियन कैलेंडर, दोनों ही मामलों में पीछे हो गया. तब इस देश ने सोचा कि ये जूलियन कैलेंडर की ओर दोबारा लौटेगा. स्वीडन में 30 फरवरी 1712 की तारीख को तय किया गया क्योंकि उस साल जूलियन कैलेंडर को अपनाया गया और 2 लीप दिनों को जोड़ा गया.
1753 में फिर से ग्रेगोरियन कैलेंडर की ओर स्वीडन बढ़ा, पर हैरानी की बात ये रही कि उस साल 11 दिन का करेक्शन मानकर 17 फरवरी के बाद सीधे 1 मार्च का दिन तय कर दिया गया. इस तरह लोगों को लगा कि उनकी जिंदगी के 11 दिन उनसे चुरा लिए गए.
इतिहास में 30 फरवरी का दूसरा मौका सोवियत रेवोल्यूशनरी कैलेंडर के अनुसार देखने को मिलता है. सोवियत यूनियन ने 1929 में एक रेवोल्यूशनरी कैलेंडर को लागू किया था, जो 1930-31 तक के लिए था और उसमें 30 फरवरी की डेट शामिल की गई थी. इस वजह से ये भी इतिहास में काफी चर्चित वाकया है.
इस कैलेंडर में एक महीने के अंदर 5 दिन के हफ्ते हुआ करते थे. हर वर्किंग महीने में 30 दिन हुआ करते थे. बाकी बचे 5-6 दिनों को बिना महीने वाली छुट्टी की तरह माना जाता था
सात दिन के सप्ताह को खत्म करके पांच-दिन के सप्ताह करने का उद्देश्य ये था कि नॉन-वर्किंग डे में आने वाली रुकावटों से पार पाया जा सके और औद्योगिक दक्षता में सुधार किया जाए.
हालांकि, इस दौरान ग्रेगोरियन कैलेंडर को सोवियत यूनियन में लागू किया जाना जारी किया गया था. 1940 में दोबारा से 7 दिन के वर्किंग सप्ताह को फिर से शुरू किया जाने लगा है.
