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    सोने की खदान का निजीकरण कितना सही खत्म हो जाएगी गोल्ड की किल्लत आखिर क्या है स्वर्णगिरी प्रोजेक्ट…

    By Tv36 HindustanJune 28, 2026No Comments6 Mins Read
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    नई दिल्ली:– प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले अमेरिका और ईरान के युद्ध के चलते हो रही परेशानियों के चलते विदेशी मुद्रा की बचत के लिए देशवासियों से कुछ अपील की थी। जिसमें एक साल तक सोना न खरीदने और विदेश यात्रा पर न जाने जैसी अपील शामिल थी। जिसके बाद अचानक पूरे देश में सोने की खपत को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। अब जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त चुका है तो एक बार फिर भारत में सोने को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    हालांकि इस बार चर्चा सोने की खपत या कीमतों को लेकर नहीं बल्कि देश के पहले प्राइवेट गोल्ड माइन खुलने को लेकर हो रही है। यह गोल्ड माइन आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले के जोन्नागिरी गांव में शुरु हुई है। जिसके बाद इस गांव का नाम स्वर्णगिरी पड़ गया। माना जा रहा है कि आंध्र प्रदेश के अलावा देश के कई और दूसरे राज्यों में भी जल्द ही ऐसी कई और प्राइवेट गोल्ड माइन खोले जाने का प्लान है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक प्राइवेट कंपनी खदान से कितना सोना निकाल सकती है? गोल्ड माइन को लेकर क्या सरकारी नियम हैं? इससे देश में सोने के आयात पर कितना असर पड़ेगा? और जब भारत में सोने का भंडार मौजूद है तो फिर सरकार क्यों दूसरे देशों से सोना खरीदती है?
    क्या है स्वर्णगिरी?
    स्वर्णगिरी आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले के जोन्नागिरी गांव में देश की पहली प्राइवेट गोल्ड माइन है। इसे करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से विकसित किया गया है। शुरुआती सर्वेक्षणों में यहां 13 टन से अधिक सोने के भंडार की बात कही जा रही है, जबकि आगे की खोज के बाद इस आंकड़े के 42 टन तक पहुंचने की संभावना है। माना जा रहा है कि सरकार आने वाले दिनों में देश में ऐसे और प्राइवेट गोल्ड माइन को अपनी स्वीकृति दे सकती है।
    प्राइवेट कंपनी कितना सोना निकाल सकती है?
    सरकार के पास इसे लेकर कोई नियम तो नहीं हैं, लेकिन किसी भी निजी कंपनी को अपनी इच्छा अनुसार सोना निकालने की इजाजत नहीं होती है। खनन की मात्रा उस भंडार पर निर्भर करता है जिसकी स्वीकृति सरकार द्वारा प्रमाणित और स्वीकृत किया गया हो। इसके बाद ही खनन की योजना तैयार की जाती है। जिसमें यह तय किया जाता है कि कंपनी हर साल कितना सोना खदान से निकाल सकती है। क्योंकि स्वर्णगिरी का संभावित भंडार 42 टन तक पहुंच सकता है, लेकिन पहले साल में उत्पादन केवल लगभग 400 किलोग्राम रहने का अनुमान है। जिसे बाद में वर्षों में बढ़ाकर 900 किलोग्राम से एक टन तक पहुंचाया जाएगा।
    भारत में सोना समेत सभी प्रमुख खनिजों का खनन खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 तथा उससे संबंधित नियमों के तहत नियंत्रित किया जाता है। किसी भी निजी कंपनी को खनन कार्य शुरू करने से पहले एक तय प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य होता है।

    राज्य सरकारें खनिज ब्लॉकों की नीलामी करती हैं, जिसके बाद सफल बोलीदाता को खनन का अधिकार प्राप्त होता है। इसके बाद कंपनी को विस्तृत अन्वेषण कर खनिज भंडार का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना होता है।
    माइनिंग लीज मिलने के बाद खनन केवल स्वीकृत भंडार और निर्धारित उत्पादन योजना के अनुसार ही किया जा सकता है। इसके साथ ही कंपनियों को रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET) जैसे विभिन्न शुल्क भी जमा करने होते हैं।
    पर्यावरण, वन और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी सभी आवश्यक मंजूरियां लेना भी अनिवार्य है। उत्पादन, सुरक्षा और पर्यावरण मानकों की निगरानी राज्य और केंद्र सरकार की संबंधित एजेंसियां करती हैं।
    इस प्रकार, निजी कंपनियों को केवल खनन का अधिकार मिलता है, जबकि खनिज संसाधनों का स्वामित्व राज्य सरकार के पास ही रहता है।
    ओडिशा में सोने का भंडार: आंध्र प्रदेश के बाद ओडिशा को भारत का अगला प्रमुख सोना उत्पादक राज्य बनने की संभावना। देवगढ़, क्योंझर और मयूरभंज में भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान सोने के भंडार के संकेत। शुरुआती अनुमान के मुताबिक लगभग 1,685 किलोग्राम सोने के अयस्क की संभावना।

    कर्नाटक में खुलेगी खदान: ओडिशा के साथ कर्नाटक के कोप्पल और रायचूर में सोने की मौजूदगी के संकेत मिले।कुछ क्षेत्रों में 12–14 ग्राम प्रति टन तक सोने की ग्रेडिंग दर्ज।

    मध्य प्रदेश में सोने का भंडार: मध्य प्रदेश में भी संभावित भंडार के संकेत मिले हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर की महाकौशल बेल्ट में सोने की संभावनाएं चर्चा में हैं। शुरुआती सर्वेक्षण में 2–5 ग्राम प्रति टन सोने के संकेत। पुष्टि होने पर सोना और तांबा आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिल सकता है।

    भारत खपत में आगे, लेकिन उत्पादन में पीछे क्यों?
    भारत सोने की खपत के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा देश है। भारत में हर साल 700-800 टन सोना खपत होता है। जिसका लगभग 99 प्रतिशत दूसरे देशों से निर्यात किया जाता है। यानी भारत खपत के मामले में सबसे आगे है, लेकिन उत्पादन के मामले में काफी पीछे है। हालांकि हमेशा से ऐसा नहीं था। 1970 और 1980 के दशक में भारत का सालाना उत्पादन करीब 5 टन था, जो तब चीन ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के माना जाता था। लेकिन फिर धीरे-धीरे भारत सोने के उत्पादन के क्षेत्र में पीछे हो गया।

    इसके पीछे मुख्यतः दो बड़े कारण थे। पहले देश में सोने की खोज और उससे जुड़ी रिसर्च गतिविधियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। दूसरा देश में खनन से जुड़ी मंजूरियों और नियामकीय प्रक्रियाओं का लंबा होना। सरकार का ध्यान दशकों तक सोने की जगह कोयला, लौह अयस्क, तांबा और जस्ता जैसे खनिजों पर रहा। जिनका इस्तेमाल औद्योगिक विकास के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना गया। हालांकि 1990 के दशक में सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खोले, लेकिन वह भी अत्यधिक सीमित था।

    भारत में सोने का इतिहास
    वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, भारत में सोना खनन का इतिहास काफी पुराना है। काउंसिल के मुताबिक, देश में पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व से ही सीमित स्तर पर सोना निकाला जाता रहा है। हालांकि आधुनिक समय की बात करें तो कर्नाटक के कोलार गोल्ड फील्ड (KGF) ने भी लंबे समय तक देश की सोने की जरूरतों को पूरा किया। इसकी शुरुआत 1880 के दशक में हुई थी। 120 सालों के संचालन के दौरान यहां से 800 टन से अधिक सोना निकाला गया। लेकिन 2001 में इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया। कोलार गोल्ड फील्ड के बंद होने के बाद भारत का घरेलू सोना उत्पादन तेजी से घट गया और देश आयात पर अधिक निर्भर होता चला गया।

    नए गोल्ड फील्ड और भारत की जरूरत
    भारत हर साल करीब 700 से 900 टन सोने का आयात करता है। जबकि घरेलू उत्पादन मांग के मुकाबले बहुत कम है। हालांकि जोन्नागिरी जैसी परियोजनाएं प्रतीकात्मक और रणनीतिक महत्व जरूर रखती हैं, लेकिन अभी ये भारत के सोने की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं हैं। फिर भी अगर आंध्र प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में नए भंडार विकसित किए जा सके तो यह देश के आने वाले भविष्य पर गहरा असर डाल सकता है।
    इस नजरिए से देखें तो भारत में प्राइवेट गोल्ड माइनिंग की शुरुआत इस क्षेत्र के पुनर्जागरण की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है। यह केवल नई खदानों की शुरुआत भर नहीं है, बल्कि संबंधित क्षेत्रों के आर्थिक और औद्योगिक विकास को भी नई दिशा देने की क्षमता रखती है।

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