नई दिल्ली:- न्यूक्लियर डिलीवरी में सक्षम लड़ाकू विमानों में मिराज-2000, सुखोई-30MKI और राफेल शामिल हैं। हालांकि, इस ट्रायड के तीन हिस्सों में से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस न्यूक्लियर सबमरीन को सबसे ज्यादा सुरक्षित और असरदार माना जाता है।
भारत ने 3 अप्रैल 2026 को अपनी परमाणु त्रिशक्ति में मील का पत्थर हासिल किया है। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में शिप बिल्डिंग सेंटर में INS अरिदमन, देश की तीसरी परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी या SSBN (सबमर्सिबल शिप बैलिस्टिक न्यूक्लियर) को चुपचाप नौसेना में शामिल किया गया है। ये एक ऐतिहासिक उपलब्धि है और इसपर हर एक देशवासी को गर्व होना चाहिए। सबसे दिलचस्प बात ये है कि भारत ने इस ऐतिहासिक कामयाबी का जश्न नहीं मनाया और कोई औपचारिक घोषणा नहीं की। लेकिन देश के रक्षा मंत्री ने एक पोस्ट में कहा ‘शब्द नहीं शक्ति, अरिदमन
INS अरिदमन को भारतीय नौसेना में शामिल होना कई मायनो में काफा अहम है। समुद्र में एक SSBN की मौजूदगी सुनिश्चित करती है कि देश के पास जवाबी दूसरी हमला करने की क्षमता मौजूद है। हालांकि भारत पहले ‘परमाणु बम इस्तेमाल नहीं करने की नीति’ को मानता है कि लेकिन हमला होने की स्थिति में तत्काल परमाणु हमला करने की क्षमता भी रखता है। इस सिद्धांत को पूरा करने के लिए कम से कम तीन पनडुब्बियों की जरूरत होती है। जिसका मतलब होता है कि एक पनुडुब्बी हमेशा गश्त पर रह सके और बाकी दो पनडुब्बियों का रखरखाव और मरम्मत हो सके।
भारत की पनडुब्बी परमाणु शक्ति में जबरदस्त इजाफा
भारत की पहली स्वदेशी SSBN, INS अरिहंत (जिसे S2 भी कहा जाता है), को 1980 के दशक में शुरू हुए ‘एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल प्रोग्राम’ के तहत एक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर के तौर पर विकसित किया गया था।
6000 टन वन वाली और 83 MW के रिएक्टर से चलने वाली अरिहंत को 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पानी में उतारा था और अगस्त 2016 में इसे चुपचाप नौसेना में शामिल कर लिया गया।
नवंबर 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर बताया था कि INS अरिहंत अपनी पहली ‘डिटरेंस पेट्रोल’ से लौट आई है। इसका मतलब था कि वह परमाणु-हथियारों से लैस मिसाइलों के साथ तैनाती पर थी।
इसका अर्थ यह हुआ कि भारत का ‘न्यूक्लियर ट्रायड’ जिसमें मिसाइलें, विमान और पनडुब्बियां शामिल हैं अब पूरा हो चुका था। यानि अब भारत जमीन से, आकाश से और समंदर से परमाणु हमला करने की क्षमता रखता है और ये क्षमता सिर्फ अमेरिका, रूस, चीन और फ्रांस के पास ही है।
दूसरी SSBN, INS अरिघाट (S3) को अगस्त 2024 में नौसेना में शामिल किया गया। INS अरिदमन के शामिल होने से अब भारत को वह तीसरी पनडुब्बी मिल गई है जिसकी उसे समुद्र में लगातार निवारक क्षमता बनाए रखने के लिए जरूरत थी।
डिलीवरी सिस्टम पर फोकस
कार्नेगी इंडिया ने एक रिसर्च रिपोर्ट में बताया है कि भारत लंबे समय से पृथ्वी और अग्नि सीरीज की बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है। अग्नि-5 की रेंज सबसे ज्यादा 5,000 किलोमीटर से भी ज्यादा है और इसे एक कैनिस्टर में रखा जाता है जिससे इसे स्टोर करना, एक जगह से दूसरी जगह ले जाना और ऑपरेट करना आसान हो जाता है। 2024 में इसका टेस्ट मल्टीपल इंडिपेंडेंट री-एंट्री व्हीकल्स के साथ किया गया था यानी कई वॉरहेड जो अलग-अलग जगहों को निशाना बना सकते हैं।
न्यूक्लियर डिलीवरी में सक्षम लड़ाकू विमानों में मिराज-2000, सुखोई-30MKI और राफेल शामिल हैं। हालांकि, इस ट्रायड के तीन हिस्सों में से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस न्यूक्लियर सबमरीन को सबसे ज्यादा सुरक्षित और असरदार माना जाता है। ऐसा इसलिए कि परमाणु हमला होने की स्थिति में जमीन पर क्या हालत होंगे ये बताना मुश्किल है लेकिन उस दौरान समंदर में छिपी पनडुब्बी से तत्काल जवाबी हमला किया जा सकता है।
परमाणु हथियार रखने वाले सभी पाँच मान्यता प्राप्त देशों ने इंटरकॉन्टिनेंटल रेंज वाली सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइलों (SLBM) से लैस SSBN तैनात किए हैं।
कार्नेगी इंडिया के मुताबिक भारत के मामले में फिलहाल एक जरूरी कमी है जिसे अभी दूर किया जाना बाकी है। पनडुब्बियां अभी K-15 SLBM से लैस हैं जिसकी रेंज सिर्फ 750km है। यह रेंज इतनी कम है कि जवाबी हमला करने के लिए पनडुब्बी को दुश्मन के तट के बहुत करीब जाना पड़ेगा।
INS अरिघात और अरिदमन 3,500 किलोमीटर की कहीं ज्यादा की रेंज वाली K-4 मिसाइल ले जा सकती हैं। हालांकि इस मिसाइल का कई बार परीक्षण किया जा चुका है फिर भी इसे अभी तक ऑपरेशनल तौर पर तैनात नहीं किया गया है। इसीलिए के-4 मिसाइल की जल्द तैनाती एक बड़ी प्राथमिकता है।
K-4 भारत की समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का मुख्य आधार बनी रहेगी जब तक कि K-5 बनकर तैयार नहीं हो जाता। के-5 एक 5000 किलोमीटर से ज्यादा रेंज वाली SLBM है जो अभी डेवलपमेंट फेज में है।
चीन के लिए न्यूक्लियर अटैक सबमरीन पर करना होगा फोकस
हालांकि भारत अपनी परमाणु ताकत यानि न्यूक्लियर ट्रायड को तो मजबूत कर रहा है लेकिन SSN (न्यूक्लियर अटैक सबमरीन) के क्षेत्र में अभी एक बड़ी चुनौती और देरी का सामना कर रहा है। भारत के पास अभी SSBN (INS अरिहंत श्रेणी) हैं जो परमाणु मिसाइलें छोड़ने के लिए हैं लेकिन उसे SSN (अटैक सबमरीन) की सख्त जरूरत है। SSN दुश्मन की पनडुब्बियों का शिकार करने और लंबी दूरी तक पीछा करने के लिए बहुत तेज और घातक होती हैं।
हालांकि भारत सरकार ने 2024 में दो स्वदेशी SSN बनाने की मंजूरी दी है लेकिन पहली पनडुब्बी 2036-37 से पहले तैयार नहीं होगी। यह एक बहुत लंबा समय है। भारतीय नौसेना के पास अभी सिर्फ 17 पारंपरिक (डीजल) पनडुब्बियां हैं जिनमें से ज्यादातर पुरानी हो चुकी हैं और जल्द ही सेवा से बाहर हो जाएंगी। दूसरी तरफ चीन के पास दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है जिसमें 60 से ज्यादा पनडुब्बियां हैं (12 परमाणु संचालित)। 2035 तक चीन की आधी पनडुब्बियां परमाणु संचालित हो सकती हैं।
भारत का लक्ष्य ‘ब्लू-वॉटर नेवी’ यानि खुले समुद्र में दबदबा बनना है जिसके लिए SSN अनिवार्य है क्योंकि इनकी रेंज और पानी के नीचे रहने की क्षमता असीमित होती है। स्वदेशी तकनीक आने तक भारत रूस से ‘चक्र’ सीरीज की पनडुब्बियां लीज पर लेता रहा है। अगली रूसी परमाणु पनडुब्बी 2028 तक आने की उम्मीद है ताकि भारतीय नौसेना अपने ऑपरेशन को जारी रख सके। कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत को सिर्फ मिसाइलें दागने वाली पनडुब्बियां (SSBN) ही नहीं बल्कि शिकारी पनडुब्बियां बनाने में भी तेजी लानी होगी वरना समंदर में संतुलन बिगड़ सकता है।
