नई दिल्ली:– कनाडा के ग्रेटर टोरंटो में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने वैश्विक मंच से भारतीय समुदाय को एक बड़ा संदेश दिया है। दो हजार से अधिक हिंदुओं और समुदाय के सदस्यों की उपस्थिति वाले इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों की जिम्मेदारी केवल उस देश के प्रति नहीं है जहाँ वे रह रहे हैं, बल्कि पूरी मानवता के प्रति है। उन्होंने अपील की कि वे जिस भी देश में रहते हैं, वहां के बेहद ईमानदार और जिम्मेदार नागरिक बनें और साथ ही भारत के एकता, सेवा व मानवता के संदेश को पूरी दुनिया तक पहुंचाएं।
दोस्ती के साथ पूरी दुनिया को अपनाना
कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘दोस्ती के साथ पूरी दुनिया को अपनाना’ रखा गया था। अपने संबोधन में भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही भारतीय आज दुनिया के विभिन्न कोनों में बस चुके हैं और अलग-अलग देशों की नागरिकता ले चुके हैं, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े होने के कारण उनका यह कर्तव्य है कि वे वहां योगदान देने वाले नागरिक बनें। उन्होंने कहा कि भारतीयों को दुनिया को यह अनोखा दृष्टिकोण देना चाहिए कि सब एक हैं। व्यक्ति, समाज और पर्यावरण बिना एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाए भी विकास की राह पर साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। उनका पूरा भाषण इस बात पर केंद्रित रहा कि संपूर्ण मानवता एक परिवार है और प्रवासी भारतीयों को अपने आचरण से इसका उदाहरण पेश करना चाहिए।
एकता की विविध अभिव्यक्ति है
भारत की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि हमारी सभ्यता विविधता का सम्मान करना और सबके भीतर छिपी एकता को पहचानना सिखाती है। भारत में विविधता कभी भी एकता के मार्ग में बाधा नहीं बनती। हमारी समृद्ध परंपरा केवल ‘विविधता में एकता’ की बात नहीं करती, बल्कि यह ‘एकता की विविध अभिव्यक्तियों’ को स्वीकार करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विविधता पूरी तरह स्वाभाविक है, जबकि असली सच्चाई केवल एकता ही है।
भारत कभी महाशक्ति बनने के पीछे नहीं भागा
मोहन भागवत ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए कहा कि भारत ने हमेशा से दुनिया के साथ ज्ञान साझा किया है, लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी किसी दूसरे देश पर कब्जा करने या वहां के लोगों को जबरन बदलने का प्रयास नहीं किया। भारतीय सभ्यता जहां भी गई, अपने साथ गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद और उच्च मानवीय मूल्य लेकर गई। उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया कि जब भी भारत मजबूत और समृद्ध हुआ, उसने खुद को सैन्य या आर्थिक ‘महाशक्ति’ बनाने की कोशिश नहीं की। अपने इसी महान चरित्र और निस्वार्थ भाव के कारण भारत दुनिया का ‘विश्व गुरु’ बना, न कि कोई आक्रामक महाशक्ति।
वैश्विक संकटों का समाधान है भारत का प्राचीन ‘तीसरा रास्ता’
वर्तमान समय में दुनिया जिन गंभीर संकटों, पर्यावरण के खतरों और आपसी संघर्षों से जूझ रही है, उस पर चिंता व्यक्त करते हुए भागवत ने कहा कि आज पूरी दुनिया असमंजस में है और देश आपस में लड़ रहे हैं। विज्ञान की नई खोजों के इस्तेमाल को लेकर भी बड़ी चुनौतियां सामने खड़ी हैं। ऐसे समय में दुनिया को एक ‘तीसरे रास्ते’ की सख्त जरूरत है, जो दरअसल हिंदुस्तान का बहुत पुराना और परखा हुआ रास्ता है। यह पारंपरिक सोच व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच आपसी संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
‘हिंदू’ पहचान व्यापक है, इसे संकीर्णता में न बांधें
हिंदू शब्द को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि इसे किसी एक विशिष्ट पूजा पद्धति, भाषा या जीवन शैली तक सीमित मान लेना भूल होगी। हिंदू दर्शन सभी का सम्मान करता है और सभी को खुले दिल से स्वीकार करता है। उन्होंने दुनिया भर के हिंदुओं से एक ऐसे जिम्मेदार और आदर्श समाज का निर्माण करने का आह्वान किया जो पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बन सके। उन्होंने कहा कि केवल भौतिक और व्यावसायिक सफलता ही जीवन की अंतिम पहचान नहीं हो सकती। जीवन में छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव लाकर हमें एक जागरूक इंसान बनना चाहिए और आचरण में मानवता के प्रति प्रेम रखना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा वर्ष 1925 में स्थापित किए गए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने साल 2025 में अपने 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं और यह संगठन चरित्र निर्माण व सेवा को अपना मुख्य कार्य मानता है। मोहन भागवत वर्ष 2009 से इस संगठन के सरसंघचालक हैं और उनकी यह टोरंटो यात्रा उत्तर अमेरिका के विशेष दौरे का एक अहम हिस्सा है।
