मध्यप्रदेश:– अजब-गजब यूं ही नहीं कहा जाता है, यहां बहुत ऐसा है जो इसे अन्य राज्यों से अलग बनाता है. मध्यप्रदेश में कई ऐसे रेलवे स्टेशन पर हैं जिन पर कुछ अजीब परंपराओं का आज भी पालन किया जाता है. ऐसा ही एक रेलवे स्टेशन टंट्या भील रेलवे स्टेशन भी है. पहले यह रेलवे स्टेशन पातालपानी रेलवे स्टेशन के नाम से जाना जाता था. यहां से गुरजने वाली हर ट्रेन दो मिनट रुककर सलामी देती है, इसके बाद ही आगे बढ़ती है. ऐसा माना जाता है अगर लोको पायलट सलामी न दे तो ट्रेन हादसे का शिकार हो सकती है. यहां रुकने के बाद ही यात्रा सुरक्षित मानी जाती है.
यह रेलवे स्टेशन इंदौर के पास स्थित है और इंडियन रॉबिनहुड के नाम से मशहूर स्वतंत्रता सेनानी टंट्या भील से जुड़ा हुआ है. आजादी के जननायक टंट्या भील के मंदर के पास से गुजरने वाली ट्रेनें उन्हें दो मिनट सलाम करती हैं. इसके बाद ही ट्रेन अपने गंतव्य के लिए रवाना होती है.
आज भी ऐसी मान्यता है कि इंडियन रॉबिनहुड यानी टंट्या भील को सलामी देने के बाद ही यात्रा सुरक्षित रहती है. उन्हें सलाम करने के बाद ही ट्रेन में सवार यात्री सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच पाते हैं. यही वजह है कि यहां से गुजरने वाली ट्रेनें आज भी रुकती है और सलामी देती हैं.
सालों से इस रेलवे स्टेशन पर यह परंपरा निभाई जा रही है. रेलवे ने भी यहां खुद से एक अघोषित नियम बना रखा है. लोको पायलट यहां पहुंचने पर कुछ देर के लिए ट्रेन को रोक देते हैं. इसके बाद सलामी के लिए हार्न बजाते हैं और फिर ट्रेन को आगे बढ़ाते हैं.
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी यहां ट्रेन नहीं रोकी गई, तब यहां रेल हादसे हुए हैं. इन हादसों के बाद से ही अब कोई भी ट्रेन यहां से गुजरने से पहले टंट्या मामा सलामी देती है. टंट्या भील को टंट्या मामा भी कहते हैं. टंट्या मामा भील के प्रति यहां के लोगों में अथाह श्रद्धा है.
खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन 1842 के करीब टंट्या का जन्म हुआ था. युवावस्था में ही टंट्या अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में कूद गए. उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था. उन्हें इंडिन रॉबिनहुड भी कहा जाता है. 1889 में अंग्रेजों ने टंट्या भील को पकड़ लिया और 4 दिसंबर 1889 को फांसी दे दी गई
टंट्या मामा भील को फांसी देने के बाद उनके शव को पातालपानी के पास दफना दिया था. कहा जाता है कि टंट्या भील को यहां दफनाने के बाद ही रेल हादसे होने शुरू हो गए. लगातार हो रहे रेल हादसों के बाद स्थानीय लोगों ने टंट्या मामा का मंदिर बनवाने का फैसला किया. स्थानीय लोगों का मानना है कि टंट्या मामा की आत्मा आज भी उस क्षेत्र की रक्षा करती है.
इसके बाद से ही पातालपानी रेलवे स्टेशन से गुजरने वाली हर ट्रेन रुककर सलामी देती है और आगे बढ़ती है. वहीं रेलवे का कहना है कि पातालपानी से कालाकुंड तक रेल ट्रैक काफी खतरनाक है, इसलिए यहां ट्रेनों को रोककर ब्रेक चेक किया जाता है. क्योंकि यहां मंदिर बना हुआ है, इसलिए चालक यहां से सिर झुकाकर अपनी आस्था के अनुसार आगे बढ़ते हैं.
