नई दिल्ली:– मध्य एशिया में इन दिनों भू-राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। जिस इलाके को कभी रूस का प्रभाव क्षेत्र माना जाता था और जहां आज चीन की मजबूत पकड़ है, वहां अब ब्रिटेन तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे पांच देशों को लेकर नई रणनीतिक दौड़ शुरू हो चुकी है। सवाल उठ रहा है कि आखिर ब्रिटेन की अचानक इस क्षेत्र में दिलचस्पी क्यों बढ़ी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह ब्रेग्जिट के बाद बदली आर्थिक परिस्थितियां हैं। यूरोपीय यूनियन से अलग होने के बाद ब्रिटेन को नए बाजारों की जरूरत है। इसी कारण उसने विकासशील देशों के लिए व्यापारिक सुविधाएं बढ़ानी शुरू की हैं। उज्बेकिस्तान को हजारों उत्पाद बिना टैक्स के ब्रिटेन भेजने की छूट दी गई है, जिससे दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते मजबूत हो सकते हैं।
दूसरी बड़ी वजह ब्रिटेन में श्रमिकों की कमी है। यूरोप से मजदूरों की संख्या घटने के बाद ब्रिटेन ने मध्य एशिया के लोगों के लिए वीजा नियम आसान किए हैं। पिछले कुछ वर्षों में हजारों लोग मौसमी मजदूर के रूप में ब्रिटेन पहुंचे हैं। अब कृषि के अलावा नर्स, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन और अन्य क्षेत्रों में भी इन देशों के लोगों को बुलाने की चर्चा हो रही है।
लेकिन असली नजर जमीन के नीचे दबे खजाने पर है। मध्य एशिया में लिथियम, यूरेनियम और रेयर अर्थ मिनरल्स का बड़ा भंडार मौजूद है। इलेक्ट्रिक कारों, बैटरी और ग्रीन एनर्जी के दौर में इन खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। अभी दुनिया इन संसाधनों के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर है। ऐसे में ब्रिटेन और पश्चिमी देश नई सप्लाई चेन बनाकर इस निर्भरता को कम करना चाहते हैं।
ब्रिटेन इस क्षेत्र में सीधे टकराव के बजाय अपनी सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल कर रहा है। शिक्षा, संस्कृति और निवेश के जरिए वह रेलवे, एयरपोर्ट, खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ब्रिटिश विश्वविद्यालयों की लोकप्रियता भी उसकी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
हालांकि यह रास्ता आसान नहीं है। मध्य एशिया के कई देशों में लोकतंत्र, मानवाधिकार और प्रेस स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। रूस और चीन बिना राजनीतिक शर्तों के निवेश करते हैं, जबकि ब्रिटेन के लिए नैतिक मूल्यों और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन बनाना चुनौती बन सकता है।
अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या ब्रिटेन इस क्षेत्र में रूस और चीन के प्रभाव को चुनौती दे पाएगा या यह कोशिश सिर्फ सीमित रणनीतिक पहल बनकर रह जाएगी।
